मदारी के जमूरे का खेल
भारतीय राजनीति में मावलंकर जैसे लोक सभा अध्यक्ष और पीलू मोदी ,मीनू मसानी आचार्य कृपलानी जैसे पाक साफ राजनैतिज्ञों की भरमार रही है | संसद की गरिमा और उसमे उच्च कोटि की बहस ,तर्क वितर्क ,मन को झकझोरने वाले विचार ,नई सोच और सबसे उपर राष्ट्र हित रहा करता था | आकाशवाणी और बी बी सी से निश्चित समय पर प्रसारित होने वाले समाचारों का बेसब्री से इंतजार रहता था | दूसरे दिन के समाचार पत्रों में विस्तृत विवरण मिलता था | सभी राजनैतिक दल अपनी अपनी विचारधारा के अनुसार एजेंडा आगे बढ़ाते थे पर किसी प्रकार का विद्वेष बिरले ही सुनने को मिलता था |
19 52 से 1967 तक देश के अंदर का वातावरण लगभग शांतिप्रिय था | तत्कालीन प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री के देहांत के बाद जैसे अचानक तिकड़म जुगाड़ हेराफेरी जोड़ तोड़ की राजनीति प्रकट हुयी | कांग्रेस के दो टुकड़े इंडिकेट सिंडिकेट बने ,राजाओं और उद्योग पतियों ने मिलकर स्वतंत्र पार्टी बनायी | देश में नई रौशनी लाने और गरीबी को समाप्त करने जैसे खोखले नारों की ढाल बनाकर चुनाव की रणभेरी बजी | देश का राजनैतिक माहौल गरमाया तो फिर पीछे मुड कर नहीं देखा | नेता एक दुसरे को नीचा दिखाने के लिए तरह तरह के हथ कंडे अपनाने लगे और देखते ही देखते स्वार्थी तत्व भारतीय राजनीति में हावी होने लग गए | राजनैतिक दल विचारधारा की आपसी केमिस्ट्री छोड़ वोटों की गणित में उलझने लगे | राजनैतिक दल व्यक्तिगत संस्थाओं में बदलते नज़र आने लगे | जिसके पास जितना फण्ड उतने सांसद चुनवा लो या खरीद लो | चुनाव में बहुमत मिला ना मिला,कुछ दलों ने तो सरकार बनाने की कला में जैसे विशेषता हासिल कर ली हो | राज्यों में येन केन प्रकारेण घूमा फिरा के सरकारें बनने लगी | किसी विरोधी दल ने बनाने की हिम्मत दिखायी तो राज्यपाल महोदय मोहरे की तरह अपनी भूमिका निभाने लग गए | जब तक सर्वोदयी नेता और गैर राजनैतिक व्यक्ति राज्यपाल थे ,तब तक निष्पक्ष निर्णय होते थे |
एक बार राज्यपाल के रूप में र्निष्क्रिय या मुसीबत पैदा करने वाले राजनैतिक नेताओं की नियुक्ति होने लगी तो राज्यपाल मात्र सन्देश वाहक या आज्ञाकारी सेवक की भूमिका में दिखने लगे |
संसद और राज्यों की विधान सभाओं में चिंतनयुक्त ,पारदर्शी,मौलिक और नवीन विचार प्रकट करने पर जैसे विराम लग गया |
इन सभी स्थितियों में देश में एकता ,भाईचारा ,राष्ट्र प्रेम ,राष्ट्र के प्रति वफ़ादारी ,राष्ट्र की सुरक्षा नेताओं के मुहँ से कोरे नारों के रूप में निकल रहे है और धरातल पर यथार्थ से बहुत दूर होते है | रही सही टी वी पर प्रायोजित बहस और प्रिंट मीडिया में समाज को दिग्भ्रमित करने और तथ्य को तोड़ मरोड़ कर ऐसे पेश किया जाता है जिससे समाज में फूट पड़े और हर भारतीय अपनी भारतीयता को भूल जाये |
लगता है नेता लोग ऐसे बर्ताव कर रहे है जैसे गली के नुक्कड़ पर मदारी अपने जमूरे से उछल कूद करवाता है और लोग आन्दित होकर तालियाँ बजाते है | वह रे मेरा भारत महान , किसे पड़ी है इस देश की सभी तो अपनी अपनी रोटियां सकने में लगे हैं.
भारतीय राजनीति में मावलंकर जैसे लोक सभा अध्यक्ष और पीलू मोदी ,मीनू मसानी आचार्य कृपलानी जैसे पाक साफ राजनैतिज्ञों की भरमार रही है | संसद की गरिमा और उसमे उच्च कोटि की बहस ,तर्क वितर्क ,मन को झकझोरने वाले विचार ,नई सोच और सबसे उपर राष्ट्र हित रहा करता था | आकाशवाणी और बी बी सी से निश्चित समय पर प्रसारित होने वाले समाचारों का बेसब्री से इंतजार रहता था | दूसरे दिन के समाचार पत्रों में विस्तृत विवरण मिलता था | सभी राजनैतिक दल अपनी अपनी विचारधारा के अनुसार एजेंडा आगे बढ़ाते थे पर किसी प्रकार का विद्वेष बिरले ही सुनने को मिलता था |
19 52 से 1967 तक देश के अंदर का वातावरण लगभग शांतिप्रिय था | तत्कालीन प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री के देहांत के बाद जैसे अचानक तिकड़म जुगाड़ हेराफेरी जोड़ तोड़ की राजनीति प्रकट हुयी | कांग्रेस के दो टुकड़े इंडिकेट सिंडिकेट बने ,राजाओं और उद्योग पतियों ने मिलकर स्वतंत्र पार्टी बनायी | देश में नई रौशनी लाने और गरीबी को समाप्त करने जैसे खोखले नारों की ढाल बनाकर चुनाव की रणभेरी बजी | देश का राजनैतिक माहौल गरमाया तो फिर पीछे मुड कर नहीं देखा | नेता एक दुसरे को नीचा दिखाने के लिए तरह तरह के हथ कंडे अपनाने लगे और देखते ही देखते स्वार्थी तत्व भारतीय राजनीति में हावी होने लग गए | राजनैतिक दल विचारधारा की आपसी केमिस्ट्री छोड़ वोटों की गणित में उलझने लगे | राजनैतिक दल व्यक्तिगत संस्थाओं में बदलते नज़र आने लगे | जिसके पास जितना फण्ड उतने सांसद चुनवा लो या खरीद लो | चुनाव में बहुमत मिला ना मिला,कुछ दलों ने तो सरकार बनाने की कला में जैसे विशेषता हासिल कर ली हो | राज्यों में येन केन प्रकारेण घूमा फिरा के सरकारें बनने लगी | किसी विरोधी दल ने बनाने की हिम्मत दिखायी तो राज्यपाल महोदय मोहरे की तरह अपनी भूमिका निभाने लग गए | जब तक सर्वोदयी नेता और गैर राजनैतिक व्यक्ति राज्यपाल थे ,तब तक निष्पक्ष निर्णय होते थे |
एक बार राज्यपाल के रूप में र्निष्क्रिय या मुसीबत पैदा करने वाले राजनैतिक नेताओं की नियुक्ति होने लगी तो राज्यपाल मात्र सन्देश वाहक या आज्ञाकारी सेवक की भूमिका में दिखने लगे |
संसद और राज्यों की विधान सभाओं में चिंतनयुक्त ,पारदर्शी,मौलिक और नवीन विचार प्रकट करने पर जैसे विराम लग गया |
इन सभी स्थितियों में देश में एकता ,भाईचारा ,राष्ट्र प्रेम ,राष्ट्र के प्रति वफ़ादारी ,राष्ट्र की सुरक्षा नेताओं के मुहँ से कोरे नारों के रूप में निकल रहे है और धरातल पर यथार्थ से बहुत दूर होते है | रही सही टी वी पर प्रायोजित बहस और प्रिंट मीडिया में समाज को दिग्भ्रमित करने और तथ्य को तोड़ मरोड़ कर ऐसे पेश किया जाता है जिससे समाज में फूट पड़े और हर भारतीय अपनी भारतीयता को भूल जाये |
लगता है नेता लोग ऐसे बर्ताव कर रहे है जैसे गली के नुक्कड़ पर मदारी अपने जमूरे से उछल कूद करवाता है और लोग आन्दित होकर तालियाँ बजाते है | वह रे मेरा भारत महान , किसे पड़ी है इस देश की सभी तो अपनी अपनी रोटियां सकने में लगे हैं.