Saturday, 20 August 2016

न्यायपालिका और प्रजातंत्र

मुंबई हाई कोर्ट ने दही हांड़ी उत्सव पर हांड़ी की ऊँचाई 20 फीट और उत्सव में भाग लेने वाले प्रति भागियों की आयु सीमा 18 वर्ष तय कर ली है |
यह उत्सव सदियों से मनाया जाता रहा है | उत्सव और मेले समाज में जोश भरने का काम करते है | शादी भी अग्नि की साक्षी में पंडित बुलाकर लड़की लड़के के माँ बाप कर सकते है परन्तु समाज की कुछ परम्पराएँ रहती है | बकायदा बारात जाती है ,नाच गाना हँसी मजाक होता है और संस्कार की रस्म भी पूरी की जाती है | इसी तरह सारे उत्सवों को मनाने की परम्पराएँ रही है ,उसी के अनुसार उनको मनाया जाता है |
समाज के लोग मिलते जुलते है ,एक दूसरें को अभिवादन करते है ,खुशियाँ आदान प्रदान करते है | छोटे बड़े अमीर गरीब सब उल्लास के साथ व बिना भेदभाव के उत्सव का आनंद लेते है |इससे आपसी भाई चारा बढ़ता है और एकता बढती है |
कहा जाता है कि समाज के अपनाये जाने वाले रीति रिवाज़ ही कानून का आधार होते है | कानून बनाते वक्त समाज की मानसिकता व परम्परा को ध्यान में रखा जाता है | अगर ऐसा नहीं होता तो हिन्दू मैरिज एक्ट में मैरिज की परिभाषा में अग्नि की साक्षी तथा सात फेरों का जिक्र  नहीं होता |
अब दही हांड़ी पर फैसले की बात करें तो न्यायपालिका ने खट से फैसला सुना दिया और सीमा निर्धरित कर दी | |फैसले के पक्ष में तर्क दिया गया कि दही हांड़ी में दुर्घटनाएं होती है ,कुछ लोगों की मौत तक हो जाती है आदि आदि | अगर इसी तर्क को मान लें तो हर वर्ष मक्का मदीना में होने वाले हज में कुछ लोगों का देहांत हो जाता है |अक्सर भगदड़ मचती है आदि आदि | तो क्या वहां की न्यायपालिका ने इसमें दखल अंदाजी की ? जो होता है उस पर पूरा कंट्रोल वहां की सरकार का होता है |
हमारे यहाँ भी कानून और व्यवस्था के लिए पूरी सरकारी मशीनरी लग जाती है और दही हांड़ी तो क्या यह सरकारी मशीनरी कुम्भ मेले जैसे दुनिया के सबसे बड़े मेले के आयोजन को बखूबी अंजाम देते है |
दही हांड़ी मामले में भी न्यायपालिका को टांग अड़ाने की बजाय इस उत्सव की व्यवस्था व सुरक्षा स्थानीय राज्य सरकार पर छोड़ देनी चाहिए थी |
इसी संदर्भ में भारतीय न्याय पालिका ने गरबा नाचने की समय सीमा 10 बजे रात्री तक करके उस त्यौहार को मनाना लगभग बंद ही करवा दिया है | गरबा रात्रि में दस बजे शुरू होते थे तो अब उसे दस बजे समाप्त करना होता है | तर्क है ध्वनी प्रदूषण होता है |इसी तरह दीपावली पर पटाखे फोड़ने पर दुर्घटनाओं का तर्क देकर समय सीमा लगा दी | गणेश,गौरी या दुर्गा विसर्जन में पर्यावरण का तर्क दिया गया | मकर सक्रांति पर पतंग उड़ाने पर प्रतिबंध के लिए पक्षियों के मरने का तर्क दिया गया |
भारत में कानून सबके लिए बराबर है तो फिर न्यायपालिका सड़कों पर और यहाँ तक की रेलवे स्टेशनों के ठीक बाहर यात्रियों के आने जाने के रास्ते को रोक कर नमाज़ पढने पर छुप क्यों है ? ताजियों की ऊँचाई पर रोक क्यों नहीं ? बारा वफात पर बड़े बड़े स्पीकर पर कान फोड़ ध्वनी पर क्यों है छुप्पी ? पांच बार अज़ान पर न तो ध्वनी प्रदूषण होता है न लोगों की नींद और शांति में खलल पड़ता है ?
न्यायपालिका को अपनी गरिमा बरकरार रखते हुए प्रशाशनिक और विधायिका के कार्यों में दखल अंदाजी से बचना चाहिए |        

करुणा शंकर ओझा
EMAIL:ks_ojhaji@yahoo.com       

Tuesday, 2 August 2016

सत्यमेव जयते

सत्यमेव  जयते 


हिंदुस्तान में अगर आप नियमित अख़बार पढ़तें हों ,टी वी पर समाचार सुनते हो,सोशल मीडिया में थोडा बहुत फेसबुक ट्विटर व्हाट्स अप के मुखातिब होते हों तो ऐसा लगेगा कि देश में चारों तरफ अपराध ही अपराध हो रहे है,जनता लाचार है और सरकारी मशीनरी निष्क्रिय है |
समाचार बनाने वालों की फैक्ट्री चल निकली है और लोगों को चटपटी सनसनीखेज समाचारों को पढने सुनने की आदत डाली जा रही है | हालात यहाँ तक पहुंचे है कि पाठकों व दर्शकों के लिए नित नयी कहानी प्रस्तुत करने की होड़ लग गयी है | इस धक्कम पेल में क्या सही है और क्या गलत है यह पता ही नहीं चलता है |
एक ही खबर को अलग अलग एजेंसियां अलग अलग तरीके से पेश कर रही है | कभी कभी तो एक की समाचार को अलग अलग अख़बार ऐसे छापते है कि समाचार का अर्थ एकदम उल्टा लगने लगता है |
जनता असमंजस में रहती है कि यह हो क्या रहा है ? कश्मीर के “बुरहान वाली” के समाचार पढ़ें तो कोई अख़बार उसे लश्कर ऐ तौबा का खूंखार आतंकवादी बता रहा है तो कोई उसे शरीफ मासूम लड़का बताता है |कोई उसके जनाजे में ढाई लाख लोगों के शामिल होने का दावा करते है तो कोई दस हजार लोगों के शामिल होने की बात करते है | किसे सही माने और किसे गलत |
ऐसे ही जब कोई घटना एक प्रदेश में होती है तो सत्ताधारी पक्ष एक बात करता है तो विपक्ष वाले उसमे नमक मिर्च मिला के लगी हुई आग में घी डालने का काम करते है |
प्रजातंत्र में विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण है और उसे सत्ता पक्ष की नीतियों की आलोचना करने का पूरा अधिकार है | परन्तु हाल ही में हुए उना गुजरात में दलितों की पिटायी का मामला हो या बुलंदशहर उत्तर प्रदेश में बलात्कार व लूट का मामला,राजनैतिक दलों के प्रवक्ता ऐसे भाषण देने लगते है जैसे उस राज्य में जहाँ उनका दल सत्ता में है वहां तो पूरा राम राज्य ही है और वहां पूर्णतया परम शांति है |

भारत जैसे विशाल देश में कहीं न कहीं कुछ तो होगा ही, परन्तु तिल का ताड़ बनाने की कला में हमारा मीडिया और हमारे कुछ नेता पारंगत है ,इसमें किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए | हरियाणा के गुरु ग्राम ( गुड गाँव ) में भारी बारिश की वजह से चंद घंटों के लिए ट्रैफिक जाम लगा तब मीडिया रिपोर्टिंग और नेताओं की बयानबाज़ी ऐसी हो रही थी जैसे बड़ा भारी राष्ट्रिय संकट पैदा हो गया हो |मजे की बात यह रही कि उसी अंतराल में बिहार,उत्तर प्रदेश में गाँव के गाँव बाढ़ की चपेट में आ रहे थे और जान माल की हानि हो रही थी उसकी सुध लेने की किसी को नहीं पड़ी थी | सभी गुरु ग्राम की ड्रेनेज व्यवस्था का बारीकी से विश्लेषण कर रहे थे | लगभग इसी समय अमेरिका और चीन जैसे देशों में भी बाढ़ का तांडव हो रहा था | सड़कों पर जाम था और कारें व अन्य वाहन बाढ़ के पानी में बह कर जा रहे थे |  प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए अमेरिका जैसा विकसित देश लाचार हो सकता है तो हरियाणा जैसा छोटा प्रान्त क्या कर सकता है ? इस विषय पर विचार करने वाला न तो कोई राजनेता था न कोई संवाद दाता |
कुल मिला कर ऐसा लगता है कि सत्य का कोई नामों निशान नहीं है |चंद लोग जो सत्य का आचरण करते है वो मानों अल्प संख्यक हो गए हो |
ध्यान देने वाली बात यह है कि “सत्यमेव जयते भारत का 'राष्ट्रीय आदर्श वाक्य' है, जिसका अर्थ है- "सत्य की सदैव ही विजय होती है"। यह भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अंकित है।  'सत्य की सदैव विजय हो' का विपरीत होगा- 'असत्य की पराजय हो' राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, जिन्हें सत्य का सबसे बड़ा व्यवहारवादी उपासक माना जाता है, उन्होंने सत्य को ईश्वर का पर्यायवाची कहा। गाँधीजी ने कहा था कि- "सत्य ही ईश्वर है एवं ईश्वर ही सत्य है।" सत्य अगर धर्म है तो असत्य अधर्म का प्रतीक है। 
भारत सरकार के राजकीय चिह्न 'अशोक चक्र' के नीचे लिखा 'सत्यमेव जयते' हर भारतीय को अहसास दिलाता है कि सत्य हमारे लिये एक तथ्य नहीं वरन् हमारी संस्कृति का सार है। 
परन्तु रात दिन गांधीजी के नाम का गुणगान करने वाले राजनैतिक दल के लोग जहाँ उनकी पार्टी सत्ता में है वहां घटित दलितों व महिलाओं  पर अत्याचार की घटनाओं को नजर अंदाज कर दूसरे राज्यों में घटने वाली घटनाओं पर लम्बे लम्बे भाषण देते है ,रेलियाँ निकलते है ,धरना देते है और आग को भड़काने का काम करते है ताकि उनका वोट बैंक तैयार हो जाये | ये लोग इन सब कामों से समाज को व देश को होने वाले नुक्सान की रत्ती भर भी चिंता नहीं करते है |

आवश्यकता इस बात की है कि सत्य आधारित व तथ्य आधारित समाचारों पर सटीक बयानबाज़ी व बहस हो और भारत की भोली भाली जनता को गुमराह करने का काम राजनेता और मिडिया बंद करें |

करुणा शंकर ओझा 
email: ks_ojhaji@yahoo.com

सत्यमेव जयते

सत्यमेव  जयते 


हिंदुस्तान में अगर आप नियमित अख़बार पढ़तें हों ,टी वी पर समाचार सुनते हो,सोशल मीडिया में थोडा बहुत फेसबुक ट्विटर व्हाट्स अप के मुखातिब होते हों तो ऐसा लगेगा कि देश में चारों तरफ अपराध ही अपराध हो रहे है,जनता लाचार है और सरकारी मशीनरी निष्क्रिय है |
समाचार बनाने वालों की फैक्ट्री चल निकली है और लोगों को चटपटी सनसनीखेज समाचारों को पढने सुनने की आदत डाली जा रही है | हालात यहाँ तक पहुंचे है कि पाठकों व दर्शकों के लिए नित नयी कहानी प्रस्तुत करने की होड़ लग गयी है | इस धक्कम पेल में क्या सही है और क्या गलत है यह पता ही नहीं चलता है |
एक ही खबर को अलग अलग एजेंसियां अलग अलग तरीके से पेश कर रही है | कभी कभी तो एक की समाचार को अलग अलग अख़बार ऐसे छापते है कि समाचार का अर्थ एकदम उल्टा लगने लगता है |
जनता असमंजस में रहती है कि यह हो क्या रहा है ? कश्मीर के “बुरहान वाली” के समाचार पढ़ें तो कोई अख़बार उसे लश्कर ऐ तौबा का खूंखार आतंकवादी बता रहा है तो कोई उसे शरीफ मासूम लड़का बताता है |कोई उसके जनाजे में ढाई लाख लोगों के शामिल होने का दावा करते है तो कोई दस हजार लोगों के शामिल होने की बात करते है | किसे सही माने और किसे गलत |
ऐसे ही जब कोई घटना एक प्रदेश में होती है तो सत्ताधारी पक्ष एक बात करता है तो विपक्ष वाले उसमे नमक मिर्च मिला के लगी हुई आग में घी डालने का काम करते है |
प्रजातंत्र में विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण है और उसे सत्ता पक्ष की नीतियों की आलोचना करने का पूरा अधिकार है | परन्तु हाल ही में हुए उना गुजरात में दलितों की पिटायी का मामला हो या बुलंदशहर उत्तर प्रदेश में बलात्कार व लूट का मामला,राजनैतिक दलों के प्रवक्ता ऐसे भाषण देने लगते है जैसे उस राज्य में जहाँ उनका दल सत्ता में है वहां तो पूरा राम राज्य ही है और वहां पूर्णतया परम शांति है |

भारत जैसे विशाल देश में कहीं न कहीं कुछ तो होगा ही, परन्तु तिल का ताड़ बनाने की कला में हमारा मीडिया और हमारे कुछ नेता पारंगत है ,इसमें किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए | हरियाणा के गुरु ग्राम ( गुड गाँव ) में भारी बारिश की वजह से चंद घंटों के लिए ट्रैफिक जाम लगा तब मीडिया रिपोर्टिंग और नेताओं की बयानबाज़ी ऐसी हो रही थी जैसे बड़ा भारी राष्ट्रिय संकट पैदा हो गया हो |मजे की बात यह रही कि उसी अंतराल में बिहार,उत्तर प्रदेश में गाँव के गाँव बाढ़ की चपेट में आ रहे थे और जान माल की हानि हो रही थी उसकी सुध लेने की किसी को नहीं पड़ी थी | सभी गुरु ग्राम की ड्रेनेज व्यवस्था का बारीकी से विश्लेषण कर रहे थे | लगभग इसी समय अमेरिका और चीन जैसे देशों में भी बाढ़ का तांडव हो रहा था | सड़कों पर जाम था और कारें व अन्य वाहन बाढ़ के पानी में बह कर जा रहे थे |  प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए अमेरिका जैसा विकसित देश लाचार हो सकता है तो हरियाणा जैसा छोटा प्रान्त क्या कर सकता है ? इस विषय पर विचार करने वाला न तो कोई राजनेता था न कोई संवाद दाता |
कुल मिला कर ऐसा लगता है कि सत्य का कोई नामों निशान नहीं है |चंद लोग जो सत्य का आचरण करते है वो मानों अल्प संख्यक हो गए हो |
ध्यान देने वाली बात यह है कि “सत्यमेव जयते भारत का 'राष्ट्रीय आदर्श वाक्य' है, जिसका अर्थ है- "सत्य की सदैव ही विजय होती है"। यह भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अंकित है।  'सत्य की सदैव विजय हो' का विपरीत होगा- 'असत्य की पराजय हो' राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, जिन्हें सत्य का सबसे बड़ा व्यवहारवादी उपासक माना जाता है, उन्होंने सत्य को ईश्वर का पर्यायवाची कहा। गाँधीजी ने कहा था कि- "सत्य ही ईश्वर है एवं ईश्वर ही सत्य है।" सत्य अगर धर्म है तो असत्य अधर्म का प्रतीक है। 
भारत सरकार के राजकीय चिह्न 'अशोक चक्र' के नीचे लिखा 'सत्यमेव जयते' हर भारतीय को अहसास दिलाता है कि सत्य हमारे लिये एक तथ्य नहीं वरन् हमारी संस्कृति का सार है। 
परन्तु रात दिन गांधीजी के नाम का गुणगान करने वाले राजनैतिक दल के लोग जहाँ उनकी पार्टी सत्ता में है वहां घटित दलितों व महिलाओं  पर अत्याचार की घटनाओं को नजर अंदाज कर दूसरे राज्यों में घटने वाली घटनाओं पर लम्बे लम्बे भाषण देते है ,रेलियाँ निकलते है ,धरना देते है और आग को भड़काने का काम करते है ताकि उनका वोट बैंक तैयार हो जाये | ये लोग इन सब कामों से समाज को व देश को होने वाले नुक्सान की रत्ती भर भी चिंता नहीं करते है |

आवश्यकता इस बात की है कि सत्य आधारित व तथ्य आधारित समाचारों पर सटीक बयानबाज़ी व बहस हो और भारत की भोली भाली जनता को गुमराह करने का काम राजनेता और मिडिया बंद करें |

करुणा शंकर ओझा 
email: ks_ojhaji@yahoo.com

सत्यमेव जयते

सत्यमेव  जयते 


हिंदुस्तान में अगर आप नियमित अख़बार पढ़तें हों ,टी वी पर समाचार सुनते हो,सोशल मीडिया में थोडा बहुत फेसबुक ट्विटर व्हाट्स अप के मुखातिब होते हों तो ऐसा लगेगा कि देश में चारों तरफ अपराध ही अपराध हो रहे है,जनता लाचार है और सरकारी मशीनरी निष्क्रिय है |
समाचार बनाने वालों की फैक्ट्री चल निकली है और लोगों को चटपटी सनसनीखेज समाचारों को पढने सुनने की आदत डाली जा रही है | हालात यहाँ तक पहुंचे है कि पाठकों व दर्शकों के लिए नित नयी कहानी प्रस्तुत करने की होड़ लग गयी है | इस धक्कम पेल में क्या सही है और क्या गलत है यह पता ही नहीं चलता है |
एक ही खबर को अलग अलग एजेंसियां अलग अलग तरीके से पेश कर रही है | कभी कभी तो एक की समाचार को अलग अलग अख़बार ऐसे छापते है कि समाचार का अर्थ एकदम उल्टा लगने लगता है |
जनता असमंजस में रहती है कि यह हो क्या रहा है ? कश्मीर के “बुरहान वाली” के समाचार पढ़ें तो कोई अख़बार उसे लश्कर ऐ तौबा का खूंखार आतंकवादी बता रहा है तो कोई उसे शरीफ मासूम लड़का बताता है |कोई उसके जनाजे में ढाई लाख लोगों के शामिल होने का दावा करते है तो कोई दस हजार लोगों के शामिल होने की बात करते है | किसे सही माने और किसे गलत |
ऐसे ही जब कोई घटना एक प्रदेश में होती है तो सत्ताधारी पक्ष एक बात करता है तो विपक्ष वाले उसमे नमक मिर्च मिला के लगी हुई आग में घी डालने का काम करते है |
प्रजातंत्र में विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण है और उसे सत्ता पक्ष की नीतियों की आलोचना करने का पूरा अधिकार है | परन्तु हाल ही में हुए उना गुजरात में दलितों की पिटायी का मामला हो या बुलंदशहर उत्तर प्रदेश में बलात्कार व लूट का मामला,राजनैतिक दलों के प्रवक्ता ऐसे भाषण देने लगते है जैसे उस राज्य में जहाँ उनका दल सत्ता में है वहां तो पूरा राम राज्य ही है और वहां पूर्णतया परम शांति है |

भारत जैसे विशाल देश में कहीं न कहीं कुछ तो होगा ही, परन्तु तिल का ताड़ बनाने की कला में हमारा मीडिया और हमारे कुछ नेता पारंगत है ,इसमें किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए | हरियाणा के गुरु ग्राम ( गुड गाँव ) में भारी बारिश की वजह से चंद घंटों के लिए ट्रैफिक जाम लगा तब मीडिया रिपोर्टिंग और नेताओं की बयानबाज़ी ऐसी हो रही थी जैसे बड़ा भारी राष्ट्रिय संकट पैदा हो गया हो |मजे की बात यह रही कि उसी अंतराल में बिहार,उत्तर प्रदेश में गाँव के गाँव बाढ़ की चपेट में आ रहे थे और जान माल की हानि हो रही थी उसकी सुध लेने की किसी को नहीं पड़ी थी | सभी गुरु ग्राम की ड्रेनेज व्यवस्था का बारीकी से विश्लेषण कर रहे थे | लगभग इसी समय अमेरिका और चीन जैसे देशों में भी बाढ़ का तांडव हो रहा था | सड़कों पर जाम था और कारें व अन्य वाहन बाढ़ के पानी में बह कर जा रहे थे |  प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए अमेरिका जैसा विकसित देश लाचार हो सकता है तो हरियाणा जैसा छोटा प्रान्त क्या कर सकता है ? इस विषय पर विचार करने वाला न तो कोई राजनेता था न कोई संवाद दाता |
कुल मिला कर ऐसा लगता है कि सत्य का कोई नामों निशान नहीं है |चंद लोग जो सत्य का आचरण करते है वो मानों अल्प संख्यक हो गए हो |
ध्यान देने वाली बात यह है कि “सत्यमेव जयते भारत का 'राष्ट्रीय आदर्श वाक्य' है, जिसका अर्थ है- "सत्य की सदैव ही विजय होती है"। यह भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अंकित है।  'सत्य की सदैव विजय हो' का विपरीत होगा- 'असत्य की पराजय हो' राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, जिन्हें सत्य का सबसे बड़ा व्यवहारवादी उपासक माना जाता है, उन्होंने सत्य को ईश्वर का पर्यायवाची कहा। गाँधीजी ने कहा था कि- "सत्य ही ईश्वर है एवं ईश्वर ही सत्य है।" सत्य अगर धर्म है तो असत्य अधर्म का प्रतीक है। 
भारत सरकार के राजकीय चिह्न 'अशोक चक्र' के नीचे लिखा 'सत्यमेव जयते' हर भारतीय को अहसास दिलाता है कि सत्य हमारे लिये एक तथ्य नहीं वरन् हमारी संस्कृति का सार है। 
परन्तु रात दिन गांधीजी के नाम का गुणगान करने वाले राजनैतिक दल के लोग जहाँ उनकी पार्टी सत्ता में है वहां घटित दलितों व महिलाओं  पर अत्याचार की घटनाओं को नजर अंदाज कर दूसरे राज्यों में घटने वाली घटनाओं पर लम्बे लम्बे भाषण देते है ,रेलियाँ निकलते है ,धरना देते है और आग को भड़काने का काम करते है ताकि उनका वोट बैंक तैयार हो जाये | ये लोग इन सब कामों से समाज को व देश को होने वाले नुक्सान की रत्ती भर भी चिंता नहीं करते है |

आवश्यकता इस बात की है कि सत्य आधारित व तथ्य आधारित समाचारों पर सटीक बयानबाज़ी व बहस हो और भारत की भोली भाली जनता को गुमराह करने का काम राजनेता और मिडिया बंद करें |

करुणा शंकर ओझा 
email: ks_ojhaji@yahoo.com