मुंबई हाई कोर्ट ने दही हांड़ी उत्सव पर हांड़ी की ऊँचाई 20 फीट और उत्सव में भाग लेने वाले प्रति भागियों की आयु सीमा 18 वर्ष तय कर ली है |
यह उत्सव सदियों से मनाया जाता रहा है | उत्सव और मेले समाज में जोश भरने का काम करते है | शादी भी अग्नि की साक्षी में पंडित बुलाकर लड़की लड़के के माँ बाप कर सकते है परन्तु समाज की कुछ परम्पराएँ रहती है | बकायदा बारात जाती है ,नाच गाना हँसी मजाक होता है और संस्कार की रस्म भी पूरी की जाती है | इसी तरह सारे उत्सवों को मनाने की परम्पराएँ रही है ,उसी के अनुसार उनको मनाया जाता है |
समाज के लोग मिलते जुलते है ,एक दूसरें को अभिवादन करते है ,खुशियाँ आदान प्रदान करते है | छोटे बड़े अमीर गरीब सब उल्लास के साथ व बिना भेदभाव के उत्सव का आनंद लेते है |इससे आपसी भाई चारा बढ़ता है और एकता बढती है |
कहा जाता है कि समाज के अपनाये जाने वाले रीति रिवाज़ ही कानून का आधार होते है | कानून बनाते वक्त समाज की मानसिकता व परम्परा को ध्यान में रखा जाता है | अगर ऐसा नहीं होता तो हिन्दू मैरिज एक्ट में मैरिज की परिभाषा में अग्नि की साक्षी तथा सात फेरों का जिक्र नहीं होता |
अब दही हांड़ी पर फैसले की बात करें तो न्यायपालिका ने खट से फैसला सुना दिया और सीमा निर्धरित कर दी | |फैसले के पक्ष में तर्क दिया गया कि दही हांड़ी में दुर्घटनाएं होती है ,कुछ लोगों की मौत तक हो जाती है आदि आदि | अगर इसी तर्क को मान लें तो हर वर्ष मक्का मदीना में होने वाले हज में कुछ लोगों का देहांत हो जाता है |अक्सर भगदड़ मचती है आदि आदि | तो क्या वहां की न्यायपालिका ने इसमें दखल अंदाजी की ? जो होता है उस पर पूरा कंट्रोल वहां की सरकार का होता है |
हमारे यहाँ भी कानून और व्यवस्था के लिए पूरी सरकारी मशीनरी लग जाती है और दही हांड़ी तो क्या यह सरकारी मशीनरी कुम्भ मेले जैसे दुनिया के सबसे बड़े मेले के आयोजन को बखूबी अंजाम देते है |
दही हांड़ी मामले में भी न्यायपालिका को टांग अड़ाने की बजाय इस उत्सव की व्यवस्था व सुरक्षा स्थानीय राज्य सरकार पर छोड़ देनी चाहिए थी |
इसी संदर्भ में भारतीय न्याय पालिका ने गरबा नाचने की समय सीमा 10 बजे रात्री तक करके उस त्यौहार को मनाना लगभग बंद ही करवा दिया है | गरबा रात्रि में दस बजे शुरू होते थे तो अब उसे दस बजे समाप्त करना होता है | तर्क है ध्वनी प्रदूषण होता है |इसी तरह दीपावली पर पटाखे फोड़ने पर दुर्घटनाओं का तर्क देकर समय सीमा लगा दी | गणेश,गौरी या दुर्गा विसर्जन में पर्यावरण का तर्क दिया गया | मकर सक्रांति पर पतंग उड़ाने पर प्रतिबंध के लिए पक्षियों के मरने का तर्क दिया गया |
भारत में कानून सबके लिए बराबर है तो फिर न्यायपालिका सड़कों पर और यहाँ तक की रेलवे स्टेशनों के ठीक बाहर यात्रियों के आने जाने के रास्ते को रोक कर नमाज़ पढने पर छुप क्यों है ? ताजियों की ऊँचाई पर रोक क्यों नहीं ? बारा वफात पर बड़े बड़े स्पीकर पर कान फोड़ ध्वनी पर क्यों है छुप्पी ? पांच बार अज़ान पर न तो ध्वनी प्रदूषण होता है न लोगों की नींद और शांति में खलल पड़ता है ?
न्यायपालिका को अपनी गरिमा बरकरार रखते हुए प्रशाशनिक और विधायिका के कार्यों में दखल अंदाजी से बचना चाहिए |
करुणा शंकर ओझा
EMAIL:ks_ojhaji@yahoo.com
यह उत्सव सदियों से मनाया जाता रहा है | उत्सव और मेले समाज में जोश भरने का काम करते है | शादी भी अग्नि की साक्षी में पंडित बुलाकर लड़की लड़के के माँ बाप कर सकते है परन्तु समाज की कुछ परम्पराएँ रहती है | बकायदा बारात जाती है ,नाच गाना हँसी मजाक होता है और संस्कार की रस्म भी पूरी की जाती है | इसी तरह सारे उत्सवों को मनाने की परम्पराएँ रही है ,उसी के अनुसार उनको मनाया जाता है |
समाज के लोग मिलते जुलते है ,एक दूसरें को अभिवादन करते है ,खुशियाँ आदान प्रदान करते है | छोटे बड़े अमीर गरीब सब उल्लास के साथ व बिना भेदभाव के उत्सव का आनंद लेते है |इससे आपसी भाई चारा बढ़ता है और एकता बढती है |
कहा जाता है कि समाज के अपनाये जाने वाले रीति रिवाज़ ही कानून का आधार होते है | कानून बनाते वक्त समाज की मानसिकता व परम्परा को ध्यान में रखा जाता है | अगर ऐसा नहीं होता तो हिन्दू मैरिज एक्ट में मैरिज की परिभाषा में अग्नि की साक्षी तथा सात फेरों का जिक्र नहीं होता |
अब दही हांड़ी पर फैसले की बात करें तो न्यायपालिका ने खट से फैसला सुना दिया और सीमा निर्धरित कर दी | |फैसले के पक्ष में तर्क दिया गया कि दही हांड़ी में दुर्घटनाएं होती है ,कुछ लोगों की मौत तक हो जाती है आदि आदि | अगर इसी तर्क को मान लें तो हर वर्ष मक्का मदीना में होने वाले हज में कुछ लोगों का देहांत हो जाता है |अक्सर भगदड़ मचती है आदि आदि | तो क्या वहां की न्यायपालिका ने इसमें दखल अंदाजी की ? जो होता है उस पर पूरा कंट्रोल वहां की सरकार का होता है |
हमारे यहाँ भी कानून और व्यवस्था के लिए पूरी सरकारी मशीनरी लग जाती है और दही हांड़ी तो क्या यह सरकारी मशीनरी कुम्भ मेले जैसे दुनिया के सबसे बड़े मेले के आयोजन को बखूबी अंजाम देते है |
दही हांड़ी मामले में भी न्यायपालिका को टांग अड़ाने की बजाय इस उत्सव की व्यवस्था व सुरक्षा स्थानीय राज्य सरकार पर छोड़ देनी चाहिए थी |
इसी संदर्भ में भारतीय न्याय पालिका ने गरबा नाचने की समय सीमा 10 बजे रात्री तक करके उस त्यौहार को मनाना लगभग बंद ही करवा दिया है | गरबा रात्रि में दस बजे शुरू होते थे तो अब उसे दस बजे समाप्त करना होता है | तर्क है ध्वनी प्रदूषण होता है |इसी तरह दीपावली पर पटाखे फोड़ने पर दुर्घटनाओं का तर्क देकर समय सीमा लगा दी | गणेश,गौरी या दुर्गा विसर्जन में पर्यावरण का तर्क दिया गया | मकर सक्रांति पर पतंग उड़ाने पर प्रतिबंध के लिए पक्षियों के मरने का तर्क दिया गया |
भारत में कानून सबके लिए बराबर है तो फिर न्यायपालिका सड़कों पर और यहाँ तक की रेलवे स्टेशनों के ठीक बाहर यात्रियों के आने जाने के रास्ते को रोक कर नमाज़ पढने पर छुप क्यों है ? ताजियों की ऊँचाई पर रोक क्यों नहीं ? बारा वफात पर बड़े बड़े स्पीकर पर कान फोड़ ध्वनी पर क्यों है छुप्पी ? पांच बार अज़ान पर न तो ध्वनी प्रदूषण होता है न लोगों की नींद और शांति में खलल पड़ता है ?
न्यायपालिका को अपनी गरिमा बरकरार रखते हुए प्रशाशनिक और विधायिका के कार्यों में दखल अंदाजी से बचना चाहिए |
करुणा शंकर ओझा
EMAIL:ks_ojhaji@yahoo.com
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