Monday, 19 September 2016

जन्नत से जहन्नुम तक - कौन है इसे बदसूरत करने वाले

फिल्म आरज़ू जैसी कई लोकप्रिय फिल्मों की शूटिंग 1950 से 1980 तक कश्मीर की वादियों में हुआ करती थी | कश्मीर की वादी और उसकी खूबसूरती को लेकर अनेक मधुर फिल्मी गीत लिखे गए ,गाये गए और फिल्माए गए | ये सारे गीत इतने रोमांटिक है कि अब भी हर उम्र का व्यक्ति यदा कदा गुन गुनाता है |जन्नत जैसी खूबसूरती को भला कौन नहीं देखना और महसूस करना चाहेगा |
1990 आते आते दहशत की आग लगने लगी और फिल्मों की शूटिंग ,डल झील के शिकारों और हाउस बोट में सैलानियों की संख्या नहीं के बराबर होने लगी | कौन जाएगा मरने वहाँ या यूं कहिए मौज मस्ती करने की बजाय डरा डरा सैलानी अपने को और अपने परिवार को खतरे मे क्यों डालेगा ?
2011 के जून के महीने में मैं व मेरी पत्नी हिम्मत करके श्रीनगर पहुँच गए | हवाई अड्डे पर उतरे तो लगा की यात्रियों से ज्यादा तो सुरक्षा कर्मी थे वहाँ | गीलानी भी हमारी फ्लाइट में ही दिल्ली से श्रीनगर आए थे उस दिन | मैंने सोचा शायद इस नेता की वजह से ऐसा नज़ारा है | परंतु हवाई अड्डे के बाहर आते ही सड़क पर भी थोड़े थोड़े फासले पर सुरक्षा कर्मी नज़र आए | बख्तर बंद गाडियाँ यहाँ वहाँ दौड़ती नज़र आई |

डल झील वीरान सी ,होटल मे 200-250 की क्षमता के सामने बमुसकिल 10-15 यात्री | मुग़ल गार्डेन्स ,झरना व अन्य दृशनीय स्थल पर जाने से पहले रास्ते में ही जगह जगह चेकिंग और सुरक्षा कर्मी | स्थानीय बाज़ार ग्राहक के इंतज़ार में ,दूकानदारों का अच्छा बर्ताव ,खुल कर बात ,सामान्य स्थिति के इंतज़ार में | शिकारे वाले भी खुश मिजाज और यात्री मिला तो जैसे लॉटरी खुली ऐसी खुशी | होटल मालिक और स्टाफ सभी यात्रियों की दिल से प्यार से सेवा के लिए तत्पर | हम जैसे शाकाहारी यात्रियों के लिए शुद्ध शाकाहारी भोजन की व्यवस्था | लाल चौक पर हमारा गाइड दीवारों पर लगे गोलियों के निशान हमे दिखाते हुये हमसे भी ज्यादा दुखी |  डल झील पर स्थानीय नागरिकों से बातचीत में भी कहीं भी दुर्भावना जैसी बात नहीं | कैसा लगता है कश्मीर आपको के उत्तर में बहुत अच्छा सुनने पर अत्यंत खुश | लंबे चौड़े नागरिकों ने राह चलते हुये भी हम लोगों के साथ फोटो खिंचाने पर कोई परहेज नहीं |
अब 2016 में जो चित्र नज़र आ रहा है या यह कहिए मीडिया दिखा रहा है उस पर विस्वास नहीं होता |
चंद अलगाव वादी कश्मीर नहीं है ,चंद पत्थर फेकने वाले पूरा कश्मीर नहीं है | बस इन अलगाव वादियों और इसी किस्म के राजनेताओं से घाटी को मुक्त करा दो ।कश्मीर की घाटी जन्नत के रूप में नज़र आने लगेगी |
कश्मीर का सामान्य नागरिक,व्यापारी,विद्यार्थी,महिलाएं ,मजदूर और शिकारे ,हाउस बोट वाले उस समय का इंतज़ार कर रहे है जब घाटी को इन अलगाव वादियों से मुक्ति मिलेगी |
धरती पर स्वर्ग को जहन्नुम बनाने वालों की पहचान हो चुकी है ,सिर्फ उन्हे वहाँ से हटाना है |
करुणा शंकर ओझा
email: ks_ojha@yahoo.com

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