विपक्षी दल या विरोधी दल
16 नवम्बर से संसद का शीत कालीन सत्र प्रारम्भ हो रहा है | लोक सभा स्पीकर ने सर्व दलीय बैठक कर ली है | राजनैतिक दल भी अपने अपने सांसदों की बैठक कर रहे है | विपक्षी दलों की इन बैठकों में अमूमन यह चर्चा हो रही है कि कैसे सरकार को घेरा जाय और सत्ता पक्ष के दल यह तैय्यारी कर रहे है कि विपक्ष के आक्षेपों का क्या और कैसे उत्तर दिया जाय |
संसद में देश हित ,जनहित के विषयों पर चर्चा और बहस एक स्वस्थ प्रजातंत्र की निशानी है | इन चर्चाओं से अच्छे सुझाव सरकार के ध्यान में लाये जाय ताकि जनहित के कानून बनाये जा सके और सरकार के सभी निर्णय ठोक बजा कर लिए जा सके |
संसद की कार्यवाही पर प्रति मिनट करोड़ों रूपये खर्च होते है | यह रुपया इस देश की जनता ने टैक्स के रूप में सरकारी खजाने में जमा करवाया हुआ होता है |
यह देखने में आया है कि विपक्ष बड़े ही आक्रामक रूप से सरकार के हर निर्णय का विरोध करता है | कभी कभी तो शिष्टाचार ,अनुशासन व भाषा की सारी मर्यादाएं लाँघ दी जाती है | सांसदों की आपस में हाथापाई ,धक्का मुक्की ,शोर शराबा तो आम बात है | ज्यादातर सांसद तो भूल जाते है कि देश की जनता उन्हें टी. वी .पर लाइव देख रहे है |
कभी कभी विपक्ष, विपक्ष न लगकर सरकार के दुश्मन लगने लगता है | संसद प्रजातंत्र का मंदिर होता है ,उसमे स्वस्थ परम्पराओं का पालन अपेक्षित है, पर होता है इसका उल्टा | संसद का एक पूरा सत्र जी. एस. टी. बिल की भेंट चढ़ गया |करोड़ों रूपये खर्च हो गए और संसद में उछल कूद को देश की समस्त जनता ने देखा |प्रश्न यह उठता है कि विपक्ष को विपक्ष की भूमिका निभानी है या विरोध की ? ऐसा लगता है कि प्रजातान्त्रिक तरीके से और भारी बहुमत से चुनी हुई सरकार के हर निर्णय ,हर निर्देश ,हर कार्यक्रम ,हर प्रस्ताव का विरोध करना की विपक्ष का काम रह गया है | सरकार कुछ काम तो जनहित में करती ही होगी पर विपक्ष उन कामों की अनदेखी कर आलोचना में लगा रहता है |
वर्तमान शीत कालीन सत्र भी 500 ,1000 के करेंसी नोटों के चलन को बंद करने के सरकार के निर्णय के विरोध में ही बर्बाद न हो जाय और एक बार फिर जी. एस. टी. के मुद्दे की तरह इस मुद्दे पर आरोप प्रत्यारोप में ही संसद का समय जाया न हो जाय |
क्या विपक्ष वास्तव में विपक्ष की भूमिका निभा कर सरकार की आलोचना करते हुए भी निरंतर विरोध का सिलसिला बंद नहीं कर सकता ? क्या नयी सोच के साथ संसद में स्वस्थ परम्पराएँ शुरू नहीं की जा सकती ? क्या जनहित और राष्ट्र हित के सभी कार्यों में विपक्ष को भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभानी चाहिए ?
इस के लिए आवश्यक है की विपक्षी दल अपने को विरोधी दल न समझ कर विपक्षी दल समझे | आखिर सांसद पक्ष का हो या विपक्ष का , वह इस देश का सांसद है ,सभी सांसदों ने भारत के प्रति वफ़ादारी और जनता की सेवा का व्रत लिया है तो फिर यह लगातार विरोध क्यों ? सुझाव है कि प्रत्येक सांसद, प्रत्येक सत्र में प्रति दिन उस शपथ को पढ़ कर ही संसद में कदम रखें जो उन्होंने सांसद बनते समय ली थी |जनता के कल्याण के बारे में सोचें | अपने संकुचित दायरे से व अपने या अपने दल के स्वार्थ से ऊपर उठ कर भारत के लिए काम करें जिस काम के लिए इस देश की जनता ने उन्हें चुना है |
करुणा शंकर ओझा
ईमेल : ks_ojhaji@yahoo.com
16 नवम्बर से संसद का शीत कालीन सत्र प्रारम्भ हो रहा है | लोक सभा स्पीकर ने सर्व दलीय बैठक कर ली है | राजनैतिक दल भी अपने अपने सांसदों की बैठक कर रहे है | विपक्षी दलों की इन बैठकों में अमूमन यह चर्चा हो रही है कि कैसे सरकार को घेरा जाय और सत्ता पक्ष के दल यह तैय्यारी कर रहे है कि विपक्ष के आक्षेपों का क्या और कैसे उत्तर दिया जाय |
संसद में देश हित ,जनहित के विषयों पर चर्चा और बहस एक स्वस्थ प्रजातंत्र की निशानी है | इन चर्चाओं से अच्छे सुझाव सरकार के ध्यान में लाये जाय ताकि जनहित के कानून बनाये जा सके और सरकार के सभी निर्णय ठोक बजा कर लिए जा सके |
संसद की कार्यवाही पर प्रति मिनट करोड़ों रूपये खर्च होते है | यह रुपया इस देश की जनता ने टैक्स के रूप में सरकारी खजाने में जमा करवाया हुआ होता है |
यह देखने में आया है कि विपक्ष बड़े ही आक्रामक रूप से सरकार के हर निर्णय का विरोध करता है | कभी कभी तो शिष्टाचार ,अनुशासन व भाषा की सारी मर्यादाएं लाँघ दी जाती है | सांसदों की आपस में हाथापाई ,धक्का मुक्की ,शोर शराबा तो आम बात है | ज्यादातर सांसद तो भूल जाते है कि देश की जनता उन्हें टी. वी .पर लाइव देख रहे है |
कभी कभी विपक्ष, विपक्ष न लगकर सरकार के दुश्मन लगने लगता है | संसद प्रजातंत्र का मंदिर होता है ,उसमे स्वस्थ परम्पराओं का पालन अपेक्षित है, पर होता है इसका उल्टा | संसद का एक पूरा सत्र जी. एस. टी. बिल की भेंट चढ़ गया |करोड़ों रूपये खर्च हो गए और संसद में उछल कूद को देश की समस्त जनता ने देखा |प्रश्न यह उठता है कि विपक्ष को विपक्ष की भूमिका निभानी है या विरोध की ? ऐसा लगता है कि प्रजातान्त्रिक तरीके से और भारी बहुमत से चुनी हुई सरकार के हर निर्णय ,हर निर्देश ,हर कार्यक्रम ,हर प्रस्ताव का विरोध करना की विपक्ष का काम रह गया है | सरकार कुछ काम तो जनहित में करती ही होगी पर विपक्ष उन कामों की अनदेखी कर आलोचना में लगा रहता है |
वर्तमान शीत कालीन सत्र भी 500 ,1000 के करेंसी नोटों के चलन को बंद करने के सरकार के निर्णय के विरोध में ही बर्बाद न हो जाय और एक बार फिर जी. एस. टी. के मुद्दे की तरह इस मुद्दे पर आरोप प्रत्यारोप में ही संसद का समय जाया न हो जाय |
क्या विपक्ष वास्तव में विपक्ष की भूमिका निभा कर सरकार की आलोचना करते हुए भी निरंतर विरोध का सिलसिला बंद नहीं कर सकता ? क्या नयी सोच के साथ संसद में स्वस्थ परम्पराएँ शुरू नहीं की जा सकती ? क्या जनहित और राष्ट्र हित के सभी कार्यों में विपक्ष को भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभानी चाहिए ?
इस के लिए आवश्यक है की विपक्षी दल अपने को विरोधी दल न समझ कर विपक्षी दल समझे | आखिर सांसद पक्ष का हो या विपक्ष का , वह इस देश का सांसद है ,सभी सांसदों ने भारत के प्रति वफ़ादारी और जनता की सेवा का व्रत लिया है तो फिर यह लगातार विरोध क्यों ? सुझाव है कि प्रत्येक सांसद, प्रत्येक सत्र में प्रति दिन उस शपथ को पढ़ कर ही संसद में कदम रखें जो उन्होंने सांसद बनते समय ली थी |जनता के कल्याण के बारे में सोचें | अपने संकुचित दायरे से व अपने या अपने दल के स्वार्थ से ऊपर उठ कर भारत के लिए काम करें जिस काम के लिए इस देश की जनता ने उन्हें चुना है |
करुणा शंकर ओझा
ईमेल : ks_ojhaji@yahoo.com
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