Thursday, 1 December 2016

क्या "व्हाट्स- अप" फोटो शॉप और अफवाह फैलाने वालों के लिए खुला मैदान बन गया है ?

क्या "व्हाट्स-अप" फोटो शॉप और अफवाह फैलाने वालों के लिए खुला मैदान बन गया है ?

कल व्हाट्स-अप पर ब्रेकिंग न्यूज़  के रूप मे कुछ स्क्रीन आए, जिनमे लिखा था कि पहली जनवरी 2017 से पूरे देश में सभी किसानों के कर्जे माफ होंगे,सभी टैक्स समाप्त होंगे आदि आदि | स्क्रीन भी हूबहू ऐसी बनायी गयी थी कि असली ही लगे पर किसी टी॰ वी॰ चैनल का नाम नजर नहीं आ रहा था | एक बार तो पढ़ा लिखा आदमी भी गच्चा खा जाए | जब जांच की तो पता चला की यह खबर फर्जी थी।

कुछ समय से ए॰ बी॰ पी॰ न्यूज़ चेनल, सोशल मीडिया पर वाइरल हुये ऐसे समाचारों की जांच पड़ताल कर दर्शकों को बताता है कि मैसेज गलत है या सही | पिछले साल डेढ़ साल से कुछ लोगों द्वारा गलत खबरों व अफवाहों  का निर्माण कर जानबूझ कर पोस्ट किया जा रहा है | बड़ी अफवाए फैलाई जा रही है | लोगों को भ्रमित किया जा रहा है | धीरे धीरे लोगों का व्हाट्स-अप से भरोसा ही समाप्त हो रहा है |

सोशल मीडिया मे जब "ओरकुट" आया तो बड़ा कोतूहल भरा लगा | अपनी खुशी,गम और व्यक्तिगत समाचार को सॉफ्ट कॉपी के रूप मे सार्वजनिक रूप से लोगों तक पहुंचाने का आसान तरीका था | साथ साथ इंटरनेट तो था ही पर वो पूर्ण रूप से व्यक्ति से व्यक्ति को सॉफ्ट कॉपी में चिट्ठी लिखने जैसा लगने लगा था | "ओरकुट" को अपनी प्राकृतिक मौत के हवाले कर दिया फेसबुक ने | जब फेसबुक आया तो मानों तहलका मच गया हो | शुरू शुरू में लोगों ने बड़ी ईमानदारी से समाचार,फोटो ,विचार आदि प्रस्तुत किए ,बड़ा अच्छा लगता था ,जब कोई भुला बिसरा दोस्त 40 या 50 वर्ष बाद हैलो हाय करता और अपने व्यक्तिगत विचार साझा करता |

देखते ही देखते "व्हाट्स-अप" आया और छा गया | लेकिन किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि सोशल मीडिया के इतने शक्तिशाली माध्यम का इस कदर दुरुपयोग भारत में होगा |
तस्वीर नाईजेरिया की ,बता रहे है भारत की ,तस्वीर सन 2012 की ,बतायी जा रही है 2016 की |तस्वीर किसी की,बताएँगे किसी की,किसी की गर्दन से ऊपर का भाग फोटो से काट कर किसी और के फोटो से जोड़ दिया जाता है | इस तरह फोटो शॉप के कलाकारों ने सत्यानाश कर रखा है |

दंगा ,फसाद फैलाने के उद्देश्य से एक समुदाय विशेष की भावनाओं को दूसरे के खिलाफ व्हाट्स-अप भड़काना, कुछ लोगों का मुख्य पेशा हो गया है |
साइबर कानून के रहते हुये और पुलिस के सख्त रवैये के बावजूद सोशल मीडिया पर झूठी खबरों का हर रोज़ ढेर लग जाता है |

आज कल नोट बंदी को लेकर भी तरह तरह की अफवाहें फैलायी जा रही है ,जैसे 2000 का नोट छ्ह महीने बाद में बंद होने वाला है , देश मे 90 % लोगों के पास बैंक अकाउंट नहीं है , नए 500 और 2000 के नोट का रंग उतर जाता है ,इसमे प्रिंटिंग मिस्टेक है ,इसमे मराठी मे गलत लिखा गया है आदि आदि | ये और इनके जैसी बहुत सारी बातों को खबर के रूप मे  व्हाट्स अप पर वाइरल कर जनता को गुमराह करने का काम बड़े ज़ोर शोर से चल रहा है |

आम जनता से आशा की जाती है कि  व्हाट्स अप मिलने वाले हर समाचार पर विश्वास न करें | उस समाचार को अखबार,रेडियो ,टी॰वी॰पर क्रॉस चेक अवश्य करले |  इस कलयुग के जमाने में हम सभी को बहुत ही सतर्क व सावधान रहने की आवश्यकता है | अस्तु

करुणा शंकर ओझा
email: ks_ojhaji@yahoo.com

Tuesday, 15 November 2016

विपक्षी दल या विरोधी दल

विपक्षी दल  या विरोधी दल 

16 नवम्बर से संसद का शीत कालीन सत्र प्रारम्भ हो रहा है | लोक सभा स्पीकर ने सर्व दलीय बैठक कर ली है | राजनैतिक दल भी अपने अपने सांसदों की बैठक कर रहे है | विपक्षी दलों की इन बैठकों में अमूमन यह चर्चा हो रही है कि कैसे सरकार को घेरा जाय और सत्ता पक्ष के दल यह तैय्यारी कर रहे है कि विपक्ष के आक्षेपों का क्या और कैसे उत्तर दिया जाय |
संसद में देश हित ,जनहित के विषयों पर चर्चा और बहस एक स्वस्थ प्रजातंत्र की निशानी है | इन चर्चाओं से अच्छे सुझाव सरकार के ध्यान में लाये जाय ताकि जनहित के कानून बनाये जा सके और सरकार के सभी निर्णय ठोक बजा कर लिए जा सके |
संसद की कार्यवाही पर प्रति मिनट करोड़ों रूपये खर्च होते है |  यह रुपया इस देश की जनता ने टैक्स के रूप में सरकारी खजाने में जमा करवाया हुआ होता है |
यह देखने में आया है कि विपक्ष बड़े ही आक्रामक रूप से सरकार के हर निर्णय का विरोध करता है | कभी कभी तो शिष्टाचार ,अनुशासन व भाषा की सारी मर्यादाएं लाँघ दी जाती है | सांसदों की आपस में हाथापाई ,धक्का मुक्की ,शोर शराबा तो आम बात है | ज्यादातर सांसद तो भूल जाते है कि देश की जनता उन्हें टी. वी .पर लाइव देख रहे है |
कभी कभी विपक्ष, विपक्ष न लगकर सरकार के दुश्मन लगने लगता है | संसद प्रजातंत्र का मंदिर होता है ,उसमे स्वस्थ परम्पराओं का पालन अपेक्षित है, पर होता है इसका उल्टा | संसद का एक पूरा सत्र जी. एस. टी. बिल की भेंट चढ़ गया |करोड़ों रूपये खर्च हो गए और संसद में उछल कूद को देश की समस्त जनता ने देखा |प्रश्न यह उठता है कि विपक्ष को विपक्ष की भूमिका निभानी है या विरोध की ? ऐसा लगता है कि प्रजातान्त्रिक तरीके से और भारी बहुमत से चुनी हुई सरकार के हर निर्णय ,हर निर्देश ,हर कार्यक्रम ,हर प्रस्ताव का विरोध करना की विपक्ष का काम रह गया है | सरकार कुछ काम तो जनहित में करती ही होगी पर विपक्ष उन कामों की अनदेखी कर आलोचना में लगा रहता है |
वर्तमान शीत कालीन सत्र भी 500 ,1000 के करेंसी नोटों के चलन को बंद करने के सरकार के निर्णय के विरोध में ही बर्बाद न हो जाय और एक बार फिर जी. एस. टी. के मुद्दे की तरह इस मुद्दे पर आरोप प्रत्यारोप में ही संसद का समय जाया न हो जाय |
क्या विपक्ष वास्तव में विपक्ष की भूमिका निभा कर सरकार की आलोचना करते हुए भी निरंतर विरोध का सिलसिला बंद नहीं कर सकता ? क्या नयी सोच के साथ संसद में स्वस्थ परम्पराएँ शुरू नहीं की जा सकती ? क्या जनहित और राष्ट्र हित के सभी कार्यों में विपक्ष को भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभानी चाहिए ?
इस के लिए आवश्यक है की विपक्षी दल अपने को विरोधी दल न समझ कर विपक्षी दल समझे | आखिर सांसद पक्ष का हो या विपक्ष का , वह इस देश का सांसद है ,सभी सांसदों ने भारत के प्रति वफ़ादारी और जनता की सेवा का व्रत लिया है तो फिर यह लगातार विरोध क्यों ? सुझाव है कि प्रत्येक सांसद, प्रत्येक सत्र में प्रति दिन उस शपथ को पढ़ कर ही संसद में कदम रखें जो उन्होंने सांसद बनते समय ली थी |जनता के कल्याण के बारे में सोचें | अपने संकुचित दायरे से व अपने या अपने दल के स्वार्थ से ऊपर उठ कर भारत के लिए काम करें जिस काम के लिए इस देश की जनता ने उन्हें चुना है |

करुणा शंकर ओझा
ईमेल : ks_ojhaji@yahoo.com
                 

Wednesday, 21 September 2016

बहुत हो चुका

 जब से कश्मीर के "उरी" के आतंकी हमले मे देश के 17 जवानों ने बलिदान दिया है तब से ही पूरे देश मे लोगों मे आक्रोश और गुस्सा फूट पड़ा है | कहीं जुलूस तो, कहीं सभाए, कहीं पाकिस्तान को गालियां तो कहीं मोदीजी को भला बुरा कहना | टी वी चेनल मोदीजी के पुराने विडियो क्लिप बार बार बता कर कटाक्ष करने मे नहीं चूकते |

बहुत लोग चाहते है की पाकिस्तान को तुरंत जवाब दिया जाए, हालांकि सेना ने यह स्पष्ट कर दिया है की माकूल जवाब दिया जाएगा, परंतु जवाब का समय व स्थान सेना तय करेगी | मोदी सरकार की तरफ से स्पष्ट कर दिया गया है कि अपराधियों को सजा दी जाएगी और जवानों पर हमला करवाने वालों को बक्षा नहीं जाएगा। फिर भी जनता तो जनार्दन होती है और गुस्सा उफान पकड़ता जा रहा है |

यह साधारण सी बात है की अगर कुछ करना है इसका अर्थ हुआ पाकिस्तान से युद्ध करना  |  कुछ लोग सलाह दे रहे है की केवल आतंकी ठिकानों पर हमला करके उन्हे तबाह किया जाए| कुछ लोग इसके साथ ही  पाकिस्तान पर आर्थिक पाबंदी, भारत से बहने वाली नदियों से पाकिस्तान मे जाने वाले पानी को रोकना और कुछ लोग तो पाकिस्तानी कलाकारों,गायकों ,खिलाड़ियों को भारत से निकाल बाहर करने कि सलाह दे रहे है |
एक महत्वपूर्ण सुझाव आया है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को अलग थलग किया जाए |
कुल मिला कर एक बात तो स्पष्ट है कि सेना की इच्छा शक्ति मे कोई कमी नहीं है, न ही सरकार की इच्छा शक्ति मे | संयोगवश पाकिस्तान के मुक़ाबले हम सैन्य शक्ति तथा आर्थिक रूप से भी मजबूत है |

अब ऐसी परिस्थितियों मे यदि आतंकी ठिकानों पर हमला बोला जाता है तो वह युद्ध मे परिवर्तित होना ही है |इससे पाकिस्तान को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत को आड़े हाथों लेने का मौका मिल जाएगा और पाकिस्तान को अलग थलग करने की दिशा मे बहुत बड़ी रुकावट आ जाएगी | अब अगर युद्ध होता है तो उसके परिणाम के लिए भी हमे तैयार रहना चाहिए|

पाकिस्तान से भारत के युद्ध मे चीन का क्या रुख रहेगा, इस बारे मे सोचने की जरूरत है, क्योंकि हम जिसे जम्मू और कश्मीर कहते है उसमे से उत्तर पूर्व मे "अकसाई चीन" पर चीन का ही कब्जा है ,उत्तर मे "काराकोरम" की पहाड़ियों वाले क्षेत्र पर भी चीन का कब्जा है | पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर(पी॰ ओ॰ के॰ ) के एकदम उत्तरी छोर से पाकिस्तान के दक्षिण के बलूचिस्तान मे स्थित "ग्वादार बन्दरगाह" तक हजारों किलोमीटर की सड़क परियोजना पर काम चल रहा है ,इस सड़क को चार या छ वाहन चलाने जितना चौड़ा "हाइ वे" के रूप मे विकसित किया जा रहा है, इस सड़क से इस्लामाबाद ,लाहोर,फ़ैसलाबाद,मुल्तान,करांची जैसे प्रमुख शहर जुड़ेंगे | साथ ही इसी मार्ग से लगते हुये क्षेत्र पर रेल लाईन बिछाने का काम भी गति पकड़ रहा है |

यह पूरी परियोजना "चीन पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडॉर"(सी॰ पी॰ ई ॰सी॰ )  के नाम से जानी जाती है | इस पूरे प्रोजेक्ट पर चीन ने लाखों करोड़ डॉलर लगाए है | इसका मकसद है कि चीन से मिडिल ईस्ट के देशों ,अफ्रीका और यूरोप के देशों को निर्यात करने वाले माल की ढुलाई का काम तीव्र व कम लागत मे हो | फिलहाल इन देशों मे माल भेजने के लिए चीन को बंगाल की खाड़ी होते हुये ,हिन्द महा सागर और अरब सागर होते हुटे समुद्री मार्ग से माल की ढुलाई करनी पड़ रही रही है ,यह रास्ता लंबा होने से माल पहुँचने मे कई दिन लग जाते है और ढुलाई पर खर्च भी बहुत ज्यादा आता है | इस नए कॉरीडोर से समय व खर्च मे भारी कमी आएगी | दूसरे शब्दों मे पाकिस्तान और पी ॰ओ ॰के॰ को चीन अपने देश के किसी राज्य के रूप मे इस्तेमाल कर रहा है |पूरे पाकिस्तान मे व पी॰ ओ ॰के॰ मे चीन के प्रतिनिधियों और यहाँ तक कि सैनिकों का बेरोकटोक आवागमन हो रहा है |

इन परिस्थितियों मे जब भी भारत पाकिस्तान पर हमला करेगा तो चीन तो निश्चित रूप से पाकिस्तान का ही साथ देगा, क्योंकि चीन की आर्थिक स्थिति के लिए पी॰ ओ॰ के॰ के "खूंजेराब" से बलूचिस्तान मे "ग्वादार बन्दरगाह" तक के कॉरीडोर का बड़ा हाथ है | चूंकि यह कॉरीडोर पी॰ ओ॰ के॰ से गुजरता है इसलिए चीन कभी नहीं चाहेगा की पी॰ ओ॰ के ॰या पाकिस्तान के किसी भी भाग पर अन्य किसी देश का दखल या कब्जा हो |
दूसरे शब्दो मे पाकिस्तान से युद्ध का मतलब सीधे सीधे चीन से युद्ध है | चीन परोक्ष रूप से भले ही युद्ध न करें परंतु पाकिस्तान को सैन्य सामग्री ,हथियार ,टैंक, बम वर्षक हवाई जहाज और आर्थिक मदद जरूर करेगा |
इसलिए पाकिस्तान से सीधे युद्ध मे कूद पड़ने कि बजाय पूरी तैयारी और सूझबूझ से कदम रखना होगा |
पाकिस्तान को सबक सिखाना अत्यंत जरूरी है परंतु जल्दबाज़ी मे जीती हुई बाज़ी हमे हारना नहीं है |

करुणा शंकर ओझा
email: ks_ojhaji@yahoo.com        

Tuesday, 20 September 2016

War or Peace with Pakistan

कश्मीर के "उरी" की घटना के बाद चारों तरफ शोर हो रहा है कि भारत को पाकिस्तान पर तुरंत आक्रमण करके मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए तभी सेना के जवानों का मनोबल बढ़ेगा |
युद्ध शुरू करना सरल है परन्तू उसे समेटना इतना आसान नहीं है | युद्ध मे हमारे जवानों को भी मौत के मुंह मे ढ्केलने जैसा होगा | हम हज़ार मारेंगे तो वो भी हमारे 100-200 जवानों को तो मारेंगे ही | 
इससे अच्छा यह है कि पाकिस्तान मे स्थित आतंकवादी ट्रेनिंग केम्प को निशाना बनाया जाय,जहां से हमारे ऊपर हमले की उत्पत्ति होती है |
दूसरा हाफिज़, मसूद और शालाडुदीन जैसे सरगनाओं को उनके ठिकानों पर तबाह किया जाय |
तीसरा,कश्मीर मे रहने वाले उनलोगों से निपटा जाय जो पाकिस्तानी आतंकवादी को पनाह देने,उनकी सार संभाल लेने और उनको गुप्त सूचना पहुंचाने का काम कर रहे है| इन लोगों को गिरफ्तार करके कश्मीर की जेलों मे रखने की बजाय अंडमान निकोबार की जेलों मे कम से कम दो वर्ष तक रखा जाए |
पाकिस्तान की सीमा पर उनकी फौज से आमने सामने लड़ाई का कोई परिणाम नहीं मिलने वाला है , इससे हमारे जान माल की हानि अधिक होने वाली है |


करुणा शंकर ओझा
email: ks_ojhaji@yahoo.com

War or Peace with Pakistan

कश्मीर के "उरी" की घटना के बाद चारों तरफ शोर हो रहा है कि भारत को पाकिस्तान पर तुरंत आक्रमण करके मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए तभी सेना के जवानों का मनोबल बढ़ेगा |
युद्ध शुरू करना सरल है परन्तू उसे समेटना इतना आसान नहीं है | युद्ध मे हमारे जवानों को भी मौत के मुंह मे ढ्केलने जैसा होगा | हम हज़ार मारेंगे तो वो भी हमारे 100-200 जवानों को तो मारेंगे ही | 
इससे अच्छा यह है कि पाकिस्तान मे स्थित आतंकवादी ट्रेनिंग केम्प को निशाना बनाया जाय,जहां से हमारे ऊपर हमले की उत्पत्ति होती है |
दूसरा हाफिज़, मसूद और शालाडुदीन जैसे सरगनाओं को उनके ठिकानों पर तबाह किया जाय |
तीसरा,कश्मीर मे रहने वाले उनलोगों से निपटा जाय जो पाकिस्तानी आतंकवादी को पनाह देने,उनकी सार संभाल लेने और उनको गुप्त सूचना पहुंचाने का काम कर रहे है| इन लोगों को गिरफ्तार करके कश्मीर की जेलों मे रखने की बजाय अंडमान निकोबार की जेलों मे कम से कम दो वर्ष तक रखा जाए |
पाकिस्तान की सीमा पर उनकी फौज से आमने सामने लड़ाई का कोई परिणाम नहीं मिलने वाला है , इससे हमारे जान माल की हानि अधिक होने वाली है |


करुणा शंकर ओझा
email: ks_ojhaji@yahoo.com

Monday, 19 September 2016

जन्नत से जहन्नुम तक - कौन है इसे बदसूरत करने वाले

फिल्म आरज़ू जैसी कई लोकप्रिय फिल्मों की शूटिंग 1950 से 1980 तक कश्मीर की वादियों में हुआ करती थी | कश्मीर की वादी और उसकी खूबसूरती को लेकर अनेक मधुर फिल्मी गीत लिखे गए ,गाये गए और फिल्माए गए | ये सारे गीत इतने रोमांटिक है कि अब भी हर उम्र का व्यक्ति यदा कदा गुन गुनाता है |जन्नत जैसी खूबसूरती को भला कौन नहीं देखना और महसूस करना चाहेगा |
1990 आते आते दहशत की आग लगने लगी और फिल्मों की शूटिंग ,डल झील के शिकारों और हाउस बोट में सैलानियों की संख्या नहीं के बराबर होने लगी | कौन जाएगा मरने वहाँ या यूं कहिए मौज मस्ती करने की बजाय डरा डरा सैलानी अपने को और अपने परिवार को खतरे मे क्यों डालेगा ?
2011 के जून के महीने में मैं व मेरी पत्नी हिम्मत करके श्रीनगर पहुँच गए | हवाई अड्डे पर उतरे तो लगा की यात्रियों से ज्यादा तो सुरक्षा कर्मी थे वहाँ | गीलानी भी हमारी फ्लाइट में ही दिल्ली से श्रीनगर आए थे उस दिन | मैंने सोचा शायद इस नेता की वजह से ऐसा नज़ारा है | परंतु हवाई अड्डे के बाहर आते ही सड़क पर भी थोड़े थोड़े फासले पर सुरक्षा कर्मी नज़र आए | बख्तर बंद गाडियाँ यहाँ वहाँ दौड़ती नज़र आई |

डल झील वीरान सी ,होटल मे 200-250 की क्षमता के सामने बमुसकिल 10-15 यात्री | मुग़ल गार्डेन्स ,झरना व अन्य दृशनीय स्थल पर जाने से पहले रास्ते में ही जगह जगह चेकिंग और सुरक्षा कर्मी | स्थानीय बाज़ार ग्राहक के इंतज़ार में ,दूकानदारों का अच्छा बर्ताव ,खुल कर बात ,सामान्य स्थिति के इंतज़ार में | शिकारे वाले भी खुश मिजाज और यात्री मिला तो जैसे लॉटरी खुली ऐसी खुशी | होटल मालिक और स्टाफ सभी यात्रियों की दिल से प्यार से सेवा के लिए तत्पर | हम जैसे शाकाहारी यात्रियों के लिए शुद्ध शाकाहारी भोजन की व्यवस्था | लाल चौक पर हमारा गाइड दीवारों पर लगे गोलियों के निशान हमे दिखाते हुये हमसे भी ज्यादा दुखी |  डल झील पर स्थानीय नागरिकों से बातचीत में भी कहीं भी दुर्भावना जैसी बात नहीं | कैसा लगता है कश्मीर आपको के उत्तर में बहुत अच्छा सुनने पर अत्यंत खुश | लंबे चौड़े नागरिकों ने राह चलते हुये भी हम लोगों के साथ फोटो खिंचाने पर कोई परहेज नहीं |
अब 2016 में जो चित्र नज़र आ रहा है या यह कहिए मीडिया दिखा रहा है उस पर विस्वास नहीं होता |
चंद अलगाव वादी कश्मीर नहीं है ,चंद पत्थर फेकने वाले पूरा कश्मीर नहीं है | बस इन अलगाव वादियों और इसी किस्म के राजनेताओं से घाटी को मुक्त करा दो ।कश्मीर की घाटी जन्नत के रूप में नज़र आने लगेगी |
कश्मीर का सामान्य नागरिक,व्यापारी,विद्यार्थी,महिलाएं ,मजदूर और शिकारे ,हाउस बोट वाले उस समय का इंतज़ार कर रहे है जब घाटी को इन अलगाव वादियों से मुक्ति मिलेगी |
धरती पर स्वर्ग को जहन्नुम बनाने वालों की पहचान हो चुकी है ,सिर्फ उन्हे वहाँ से हटाना है |
करुणा शंकर ओझा
email: ks_ojha@yahoo.com

Saturday, 20 August 2016

न्यायपालिका और प्रजातंत्र

मुंबई हाई कोर्ट ने दही हांड़ी उत्सव पर हांड़ी की ऊँचाई 20 फीट और उत्सव में भाग लेने वाले प्रति भागियों की आयु सीमा 18 वर्ष तय कर ली है |
यह उत्सव सदियों से मनाया जाता रहा है | उत्सव और मेले समाज में जोश भरने का काम करते है | शादी भी अग्नि की साक्षी में पंडित बुलाकर लड़की लड़के के माँ बाप कर सकते है परन्तु समाज की कुछ परम्पराएँ रहती है | बकायदा बारात जाती है ,नाच गाना हँसी मजाक होता है और संस्कार की रस्म भी पूरी की जाती है | इसी तरह सारे उत्सवों को मनाने की परम्पराएँ रही है ,उसी के अनुसार उनको मनाया जाता है |
समाज के लोग मिलते जुलते है ,एक दूसरें को अभिवादन करते है ,खुशियाँ आदान प्रदान करते है | छोटे बड़े अमीर गरीब सब उल्लास के साथ व बिना भेदभाव के उत्सव का आनंद लेते है |इससे आपसी भाई चारा बढ़ता है और एकता बढती है |
कहा जाता है कि समाज के अपनाये जाने वाले रीति रिवाज़ ही कानून का आधार होते है | कानून बनाते वक्त समाज की मानसिकता व परम्परा को ध्यान में रखा जाता है | अगर ऐसा नहीं होता तो हिन्दू मैरिज एक्ट में मैरिज की परिभाषा में अग्नि की साक्षी तथा सात फेरों का जिक्र  नहीं होता |
अब दही हांड़ी पर फैसले की बात करें तो न्यायपालिका ने खट से फैसला सुना दिया और सीमा निर्धरित कर दी | |फैसले के पक्ष में तर्क दिया गया कि दही हांड़ी में दुर्घटनाएं होती है ,कुछ लोगों की मौत तक हो जाती है आदि आदि | अगर इसी तर्क को मान लें तो हर वर्ष मक्का मदीना में होने वाले हज में कुछ लोगों का देहांत हो जाता है |अक्सर भगदड़ मचती है आदि आदि | तो क्या वहां की न्यायपालिका ने इसमें दखल अंदाजी की ? जो होता है उस पर पूरा कंट्रोल वहां की सरकार का होता है |
हमारे यहाँ भी कानून और व्यवस्था के लिए पूरी सरकारी मशीनरी लग जाती है और दही हांड़ी तो क्या यह सरकारी मशीनरी कुम्भ मेले जैसे दुनिया के सबसे बड़े मेले के आयोजन को बखूबी अंजाम देते है |
दही हांड़ी मामले में भी न्यायपालिका को टांग अड़ाने की बजाय इस उत्सव की व्यवस्था व सुरक्षा स्थानीय राज्य सरकार पर छोड़ देनी चाहिए थी |
इसी संदर्भ में भारतीय न्याय पालिका ने गरबा नाचने की समय सीमा 10 बजे रात्री तक करके उस त्यौहार को मनाना लगभग बंद ही करवा दिया है | गरबा रात्रि में दस बजे शुरू होते थे तो अब उसे दस बजे समाप्त करना होता है | तर्क है ध्वनी प्रदूषण होता है |इसी तरह दीपावली पर पटाखे फोड़ने पर दुर्घटनाओं का तर्क देकर समय सीमा लगा दी | गणेश,गौरी या दुर्गा विसर्जन में पर्यावरण का तर्क दिया गया | मकर सक्रांति पर पतंग उड़ाने पर प्रतिबंध के लिए पक्षियों के मरने का तर्क दिया गया |
भारत में कानून सबके लिए बराबर है तो फिर न्यायपालिका सड़कों पर और यहाँ तक की रेलवे स्टेशनों के ठीक बाहर यात्रियों के आने जाने के रास्ते को रोक कर नमाज़ पढने पर छुप क्यों है ? ताजियों की ऊँचाई पर रोक क्यों नहीं ? बारा वफात पर बड़े बड़े स्पीकर पर कान फोड़ ध्वनी पर क्यों है छुप्पी ? पांच बार अज़ान पर न तो ध्वनी प्रदूषण होता है न लोगों की नींद और शांति में खलल पड़ता है ?
न्यायपालिका को अपनी गरिमा बरकरार रखते हुए प्रशाशनिक और विधायिका के कार्यों में दखल अंदाजी से बचना चाहिए |        

करुणा शंकर ओझा
EMAIL:ks_ojhaji@yahoo.com       

Tuesday, 2 August 2016

सत्यमेव जयते

सत्यमेव  जयते 


हिंदुस्तान में अगर आप नियमित अख़बार पढ़तें हों ,टी वी पर समाचार सुनते हो,सोशल मीडिया में थोडा बहुत फेसबुक ट्विटर व्हाट्स अप के मुखातिब होते हों तो ऐसा लगेगा कि देश में चारों तरफ अपराध ही अपराध हो रहे है,जनता लाचार है और सरकारी मशीनरी निष्क्रिय है |
समाचार बनाने वालों की फैक्ट्री चल निकली है और लोगों को चटपटी सनसनीखेज समाचारों को पढने सुनने की आदत डाली जा रही है | हालात यहाँ तक पहुंचे है कि पाठकों व दर्शकों के लिए नित नयी कहानी प्रस्तुत करने की होड़ लग गयी है | इस धक्कम पेल में क्या सही है और क्या गलत है यह पता ही नहीं चलता है |
एक ही खबर को अलग अलग एजेंसियां अलग अलग तरीके से पेश कर रही है | कभी कभी तो एक की समाचार को अलग अलग अख़बार ऐसे छापते है कि समाचार का अर्थ एकदम उल्टा लगने लगता है |
जनता असमंजस में रहती है कि यह हो क्या रहा है ? कश्मीर के “बुरहान वाली” के समाचार पढ़ें तो कोई अख़बार उसे लश्कर ऐ तौबा का खूंखार आतंकवादी बता रहा है तो कोई उसे शरीफ मासूम लड़का बताता है |कोई उसके जनाजे में ढाई लाख लोगों के शामिल होने का दावा करते है तो कोई दस हजार लोगों के शामिल होने की बात करते है | किसे सही माने और किसे गलत |
ऐसे ही जब कोई घटना एक प्रदेश में होती है तो सत्ताधारी पक्ष एक बात करता है तो विपक्ष वाले उसमे नमक मिर्च मिला के लगी हुई आग में घी डालने का काम करते है |
प्रजातंत्र में विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण है और उसे सत्ता पक्ष की नीतियों की आलोचना करने का पूरा अधिकार है | परन्तु हाल ही में हुए उना गुजरात में दलितों की पिटायी का मामला हो या बुलंदशहर उत्तर प्रदेश में बलात्कार व लूट का मामला,राजनैतिक दलों के प्रवक्ता ऐसे भाषण देने लगते है जैसे उस राज्य में जहाँ उनका दल सत्ता में है वहां तो पूरा राम राज्य ही है और वहां पूर्णतया परम शांति है |

भारत जैसे विशाल देश में कहीं न कहीं कुछ तो होगा ही, परन्तु तिल का ताड़ बनाने की कला में हमारा मीडिया और हमारे कुछ नेता पारंगत है ,इसमें किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए | हरियाणा के गुरु ग्राम ( गुड गाँव ) में भारी बारिश की वजह से चंद घंटों के लिए ट्रैफिक जाम लगा तब मीडिया रिपोर्टिंग और नेताओं की बयानबाज़ी ऐसी हो रही थी जैसे बड़ा भारी राष्ट्रिय संकट पैदा हो गया हो |मजे की बात यह रही कि उसी अंतराल में बिहार,उत्तर प्रदेश में गाँव के गाँव बाढ़ की चपेट में आ रहे थे और जान माल की हानि हो रही थी उसकी सुध लेने की किसी को नहीं पड़ी थी | सभी गुरु ग्राम की ड्रेनेज व्यवस्था का बारीकी से विश्लेषण कर रहे थे | लगभग इसी समय अमेरिका और चीन जैसे देशों में भी बाढ़ का तांडव हो रहा था | सड़कों पर जाम था और कारें व अन्य वाहन बाढ़ के पानी में बह कर जा रहे थे |  प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए अमेरिका जैसा विकसित देश लाचार हो सकता है तो हरियाणा जैसा छोटा प्रान्त क्या कर सकता है ? इस विषय पर विचार करने वाला न तो कोई राजनेता था न कोई संवाद दाता |
कुल मिला कर ऐसा लगता है कि सत्य का कोई नामों निशान नहीं है |चंद लोग जो सत्य का आचरण करते है वो मानों अल्प संख्यक हो गए हो |
ध्यान देने वाली बात यह है कि “सत्यमेव जयते भारत का 'राष्ट्रीय आदर्श वाक्य' है, जिसका अर्थ है- "सत्य की सदैव ही विजय होती है"। यह भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अंकित है।  'सत्य की सदैव विजय हो' का विपरीत होगा- 'असत्य की पराजय हो' राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, जिन्हें सत्य का सबसे बड़ा व्यवहारवादी उपासक माना जाता है, उन्होंने सत्य को ईश्वर का पर्यायवाची कहा। गाँधीजी ने कहा था कि- "सत्य ही ईश्वर है एवं ईश्वर ही सत्य है।" सत्य अगर धर्म है तो असत्य अधर्म का प्रतीक है। 
भारत सरकार के राजकीय चिह्न 'अशोक चक्र' के नीचे लिखा 'सत्यमेव जयते' हर भारतीय को अहसास दिलाता है कि सत्य हमारे लिये एक तथ्य नहीं वरन् हमारी संस्कृति का सार है। 
परन्तु रात दिन गांधीजी के नाम का गुणगान करने वाले राजनैतिक दल के लोग जहाँ उनकी पार्टी सत्ता में है वहां घटित दलितों व महिलाओं  पर अत्याचार की घटनाओं को नजर अंदाज कर दूसरे राज्यों में घटने वाली घटनाओं पर लम्बे लम्बे भाषण देते है ,रेलियाँ निकलते है ,धरना देते है और आग को भड़काने का काम करते है ताकि उनका वोट बैंक तैयार हो जाये | ये लोग इन सब कामों से समाज को व देश को होने वाले नुक्सान की रत्ती भर भी चिंता नहीं करते है |

आवश्यकता इस बात की है कि सत्य आधारित व तथ्य आधारित समाचारों पर सटीक बयानबाज़ी व बहस हो और भारत की भोली भाली जनता को गुमराह करने का काम राजनेता और मिडिया बंद करें |

करुणा शंकर ओझा 
email: ks_ojhaji@yahoo.com

सत्यमेव जयते

सत्यमेव  जयते 


हिंदुस्तान में अगर आप नियमित अख़बार पढ़तें हों ,टी वी पर समाचार सुनते हो,सोशल मीडिया में थोडा बहुत फेसबुक ट्विटर व्हाट्स अप के मुखातिब होते हों तो ऐसा लगेगा कि देश में चारों तरफ अपराध ही अपराध हो रहे है,जनता लाचार है और सरकारी मशीनरी निष्क्रिय है |
समाचार बनाने वालों की फैक्ट्री चल निकली है और लोगों को चटपटी सनसनीखेज समाचारों को पढने सुनने की आदत डाली जा रही है | हालात यहाँ तक पहुंचे है कि पाठकों व दर्शकों के लिए नित नयी कहानी प्रस्तुत करने की होड़ लग गयी है | इस धक्कम पेल में क्या सही है और क्या गलत है यह पता ही नहीं चलता है |
एक ही खबर को अलग अलग एजेंसियां अलग अलग तरीके से पेश कर रही है | कभी कभी तो एक की समाचार को अलग अलग अख़बार ऐसे छापते है कि समाचार का अर्थ एकदम उल्टा लगने लगता है |
जनता असमंजस में रहती है कि यह हो क्या रहा है ? कश्मीर के “बुरहान वाली” के समाचार पढ़ें तो कोई अख़बार उसे लश्कर ऐ तौबा का खूंखार आतंकवादी बता रहा है तो कोई उसे शरीफ मासूम लड़का बताता है |कोई उसके जनाजे में ढाई लाख लोगों के शामिल होने का दावा करते है तो कोई दस हजार लोगों के शामिल होने की बात करते है | किसे सही माने और किसे गलत |
ऐसे ही जब कोई घटना एक प्रदेश में होती है तो सत्ताधारी पक्ष एक बात करता है तो विपक्ष वाले उसमे नमक मिर्च मिला के लगी हुई आग में घी डालने का काम करते है |
प्रजातंत्र में विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण है और उसे सत्ता पक्ष की नीतियों की आलोचना करने का पूरा अधिकार है | परन्तु हाल ही में हुए उना गुजरात में दलितों की पिटायी का मामला हो या बुलंदशहर उत्तर प्रदेश में बलात्कार व लूट का मामला,राजनैतिक दलों के प्रवक्ता ऐसे भाषण देने लगते है जैसे उस राज्य में जहाँ उनका दल सत्ता में है वहां तो पूरा राम राज्य ही है और वहां पूर्णतया परम शांति है |

भारत जैसे विशाल देश में कहीं न कहीं कुछ तो होगा ही, परन्तु तिल का ताड़ बनाने की कला में हमारा मीडिया और हमारे कुछ नेता पारंगत है ,इसमें किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए | हरियाणा के गुरु ग्राम ( गुड गाँव ) में भारी बारिश की वजह से चंद घंटों के लिए ट्रैफिक जाम लगा तब मीडिया रिपोर्टिंग और नेताओं की बयानबाज़ी ऐसी हो रही थी जैसे बड़ा भारी राष्ट्रिय संकट पैदा हो गया हो |मजे की बात यह रही कि उसी अंतराल में बिहार,उत्तर प्रदेश में गाँव के गाँव बाढ़ की चपेट में आ रहे थे और जान माल की हानि हो रही थी उसकी सुध लेने की किसी को नहीं पड़ी थी | सभी गुरु ग्राम की ड्रेनेज व्यवस्था का बारीकी से विश्लेषण कर रहे थे | लगभग इसी समय अमेरिका और चीन जैसे देशों में भी बाढ़ का तांडव हो रहा था | सड़कों पर जाम था और कारें व अन्य वाहन बाढ़ के पानी में बह कर जा रहे थे |  प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए अमेरिका जैसा विकसित देश लाचार हो सकता है तो हरियाणा जैसा छोटा प्रान्त क्या कर सकता है ? इस विषय पर विचार करने वाला न तो कोई राजनेता था न कोई संवाद दाता |
कुल मिला कर ऐसा लगता है कि सत्य का कोई नामों निशान नहीं है |चंद लोग जो सत्य का आचरण करते है वो मानों अल्प संख्यक हो गए हो |
ध्यान देने वाली बात यह है कि “सत्यमेव जयते भारत का 'राष्ट्रीय आदर्श वाक्य' है, जिसका अर्थ है- "सत्य की सदैव ही विजय होती है"। यह भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अंकित है।  'सत्य की सदैव विजय हो' का विपरीत होगा- 'असत्य की पराजय हो' राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, जिन्हें सत्य का सबसे बड़ा व्यवहारवादी उपासक माना जाता है, उन्होंने सत्य को ईश्वर का पर्यायवाची कहा। गाँधीजी ने कहा था कि- "सत्य ही ईश्वर है एवं ईश्वर ही सत्य है।" सत्य अगर धर्म है तो असत्य अधर्म का प्रतीक है। 
भारत सरकार के राजकीय चिह्न 'अशोक चक्र' के नीचे लिखा 'सत्यमेव जयते' हर भारतीय को अहसास दिलाता है कि सत्य हमारे लिये एक तथ्य नहीं वरन् हमारी संस्कृति का सार है। 
परन्तु रात दिन गांधीजी के नाम का गुणगान करने वाले राजनैतिक दल के लोग जहाँ उनकी पार्टी सत्ता में है वहां घटित दलितों व महिलाओं  पर अत्याचार की घटनाओं को नजर अंदाज कर दूसरे राज्यों में घटने वाली घटनाओं पर लम्बे लम्बे भाषण देते है ,रेलियाँ निकलते है ,धरना देते है और आग को भड़काने का काम करते है ताकि उनका वोट बैंक तैयार हो जाये | ये लोग इन सब कामों से समाज को व देश को होने वाले नुक्सान की रत्ती भर भी चिंता नहीं करते है |

आवश्यकता इस बात की है कि सत्य आधारित व तथ्य आधारित समाचारों पर सटीक बयानबाज़ी व बहस हो और भारत की भोली भाली जनता को गुमराह करने का काम राजनेता और मिडिया बंद करें |

करुणा शंकर ओझा 
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सत्यमेव जयते

सत्यमेव  जयते 


हिंदुस्तान में अगर आप नियमित अख़बार पढ़तें हों ,टी वी पर समाचार सुनते हो,सोशल मीडिया में थोडा बहुत फेसबुक ट्विटर व्हाट्स अप के मुखातिब होते हों तो ऐसा लगेगा कि देश में चारों तरफ अपराध ही अपराध हो रहे है,जनता लाचार है और सरकारी मशीनरी निष्क्रिय है |
समाचार बनाने वालों की फैक्ट्री चल निकली है और लोगों को चटपटी सनसनीखेज समाचारों को पढने सुनने की आदत डाली जा रही है | हालात यहाँ तक पहुंचे है कि पाठकों व दर्शकों के लिए नित नयी कहानी प्रस्तुत करने की होड़ लग गयी है | इस धक्कम पेल में क्या सही है और क्या गलत है यह पता ही नहीं चलता है |
एक ही खबर को अलग अलग एजेंसियां अलग अलग तरीके से पेश कर रही है | कभी कभी तो एक की समाचार को अलग अलग अख़बार ऐसे छापते है कि समाचार का अर्थ एकदम उल्टा लगने लगता है |
जनता असमंजस में रहती है कि यह हो क्या रहा है ? कश्मीर के “बुरहान वाली” के समाचार पढ़ें तो कोई अख़बार उसे लश्कर ऐ तौबा का खूंखार आतंकवादी बता रहा है तो कोई उसे शरीफ मासूम लड़का बताता है |कोई उसके जनाजे में ढाई लाख लोगों के शामिल होने का दावा करते है तो कोई दस हजार लोगों के शामिल होने की बात करते है | किसे सही माने और किसे गलत |
ऐसे ही जब कोई घटना एक प्रदेश में होती है तो सत्ताधारी पक्ष एक बात करता है तो विपक्ष वाले उसमे नमक मिर्च मिला के लगी हुई आग में घी डालने का काम करते है |
प्रजातंत्र में विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण है और उसे सत्ता पक्ष की नीतियों की आलोचना करने का पूरा अधिकार है | परन्तु हाल ही में हुए उना गुजरात में दलितों की पिटायी का मामला हो या बुलंदशहर उत्तर प्रदेश में बलात्कार व लूट का मामला,राजनैतिक दलों के प्रवक्ता ऐसे भाषण देने लगते है जैसे उस राज्य में जहाँ उनका दल सत्ता में है वहां तो पूरा राम राज्य ही है और वहां पूर्णतया परम शांति है |

भारत जैसे विशाल देश में कहीं न कहीं कुछ तो होगा ही, परन्तु तिल का ताड़ बनाने की कला में हमारा मीडिया और हमारे कुछ नेता पारंगत है ,इसमें किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए | हरियाणा के गुरु ग्राम ( गुड गाँव ) में भारी बारिश की वजह से चंद घंटों के लिए ट्रैफिक जाम लगा तब मीडिया रिपोर्टिंग और नेताओं की बयानबाज़ी ऐसी हो रही थी जैसे बड़ा भारी राष्ट्रिय संकट पैदा हो गया हो |मजे की बात यह रही कि उसी अंतराल में बिहार,उत्तर प्रदेश में गाँव के गाँव बाढ़ की चपेट में आ रहे थे और जान माल की हानि हो रही थी उसकी सुध लेने की किसी को नहीं पड़ी थी | सभी गुरु ग्राम की ड्रेनेज व्यवस्था का बारीकी से विश्लेषण कर रहे थे | लगभग इसी समय अमेरिका और चीन जैसे देशों में भी बाढ़ का तांडव हो रहा था | सड़कों पर जाम था और कारें व अन्य वाहन बाढ़ के पानी में बह कर जा रहे थे |  प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए अमेरिका जैसा विकसित देश लाचार हो सकता है तो हरियाणा जैसा छोटा प्रान्त क्या कर सकता है ? इस विषय पर विचार करने वाला न तो कोई राजनेता था न कोई संवाद दाता |
कुल मिला कर ऐसा लगता है कि सत्य का कोई नामों निशान नहीं है |चंद लोग जो सत्य का आचरण करते है वो मानों अल्प संख्यक हो गए हो |
ध्यान देने वाली बात यह है कि “सत्यमेव जयते भारत का 'राष्ट्रीय आदर्श वाक्य' है, जिसका अर्थ है- "सत्य की सदैव ही विजय होती है"। यह भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अंकित है।  'सत्य की सदैव विजय हो' का विपरीत होगा- 'असत्य की पराजय हो' राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, जिन्हें सत्य का सबसे बड़ा व्यवहारवादी उपासक माना जाता है, उन्होंने सत्य को ईश्वर का पर्यायवाची कहा। गाँधीजी ने कहा था कि- "सत्य ही ईश्वर है एवं ईश्वर ही सत्य है।" सत्य अगर धर्म है तो असत्य अधर्म का प्रतीक है। 
भारत सरकार के राजकीय चिह्न 'अशोक चक्र' के नीचे लिखा 'सत्यमेव जयते' हर भारतीय को अहसास दिलाता है कि सत्य हमारे लिये एक तथ्य नहीं वरन् हमारी संस्कृति का सार है। 
परन्तु रात दिन गांधीजी के नाम का गुणगान करने वाले राजनैतिक दल के लोग जहाँ उनकी पार्टी सत्ता में है वहां घटित दलितों व महिलाओं  पर अत्याचार की घटनाओं को नजर अंदाज कर दूसरे राज्यों में घटने वाली घटनाओं पर लम्बे लम्बे भाषण देते है ,रेलियाँ निकलते है ,धरना देते है और आग को भड़काने का काम करते है ताकि उनका वोट बैंक तैयार हो जाये | ये लोग इन सब कामों से समाज को व देश को होने वाले नुक्सान की रत्ती भर भी चिंता नहीं करते है |

आवश्यकता इस बात की है कि सत्य आधारित व तथ्य आधारित समाचारों पर सटीक बयानबाज़ी व बहस हो और भारत की भोली भाली जनता को गुमराह करने का काम राजनेता और मिडिया बंद करें |

करुणा शंकर ओझा 
email: ks_ojhaji@yahoo.com

Friday, 29 July 2016

LAWMAKERS AND LAWLESSNESS

LAWMAKERS AND LAWLESSNESS
There is a latin maxim in law books that says “Ignorantia juris non excusat” as also “ignorantia legis neminem excusat”  which means "ignorance of the law excuses not and "ignorance of law excuses no one respectively. This is a legal principle holding that a person who is unaware of a law may not escape liability for violating that law merely because he or she was unaware of its content. Hence nobody is thought to be ignorant of the law or not knowing that the law is harmful.
In the days before satellite communication and cellular phones, persons who could genuinely be ignorant of the law due to distance or isolation but today even an illiterate knows well that there is punishment for wrong parking or changing the lane while driving a vehicle on public road or for travelling without valid ticket in a train.
These laws, rules and customs are interwoven with ethical and religious dialog so that laws expressed what is right and good and deviation that which is not. Similarly there cannot be one law at Delhi and another at Mumbai, one thing now and another afterward; but the same law, unchanging and eternal, binds all sectors and sections of the society and all times.
"What’s right is right and what’s wrong is wrong. What is fine, no doubt, is everywhere legislated as fine, and what is shameful as shameful; but not the shameful as fine or the fine as shameful."
Recently a seating member of Lok Sabha Mr. Bhagwant Mann created a video from his own mobile by himself and put it on his face book showing the complete security checks and stages of entering Indian Parliament House. In the video, Mr. Mann gives a running commentary as his vehicle crosses security barricades, while entering Parliament. “I’ll today show you something you would not have seen earlier,” he says.
He enters a room where questions are being sorted and describes the process. A security official is heard telling him not to take photographs, but he replies: “I’ll not take photo… will maintain confidentiality.”

Mr. Mann is not an ordinary person he is a member of Lok Sabha and has taken the oath to protect the sovereignty of India. Thereby he is a law maker. Lok Sabha speaker took cognizance of the action of Mr. Mann and it was construed as breaching the security of parliament. The matter was debated in both houses of parliament and barring Mr. Mann himself every MP irrespective of their affiliation to political parties, accused and cornered Mr. Mann. Lok Sabha speaker told members of the House that the matter is serious and promised to take appropriate action against Mr. Mann. The chairs in both Houses were under considerable pressure from the members to take appropriate punitive action against the errant AAP MP, as a majority felt that it is a matter of national security being compromised. During debate, he was seen all alone facing the music.

 Lok Sabha Speaker summoned Mr.Maan and discussed the matter and reportedly expressed her displeasure and unhappiness over breaching specific rules related to the Lok Sabha, and in particular his move to video live streams his movements in Parliament. Mr.Maan is being charged with breaching the following Lok Sabha rules like 334(A) that prohibits advance publicity and 352 that says no inter-alia video recording.
Press and Publication Rules says any recording, certain areas like security gates etc not to be recorded (which he has done) and as per the case of security breach it is considered as compromise of security and grave misdemeanor.
Majority of members of Lok Sabha asked for a privilege motion against him, for “endangering security” of the heavily-guarded complex.
But an adamant and defiant Mr. Mann had said that he would repeat the live streaming next day also and added that he had done nothing wrong. Subsequently on realizing that there is no escape he apologized in writing to avoid any punitive action.
Mr.Maan has also tried to twist the matter by saying that it was not his intention to endanger the security of Parliament or its members, and claimed that he only wanted to show people in his constituency in Punjab a glimpse of Parliament and its functioning.
Subsequently a committee of 9 MPs has been formed to decide on the matter and it shall submit its report shortly to the speaker of Lok Sabha.

In retaliation, this law maker wrote a letter to the LS Speaker in which he has demanded a thorough probe against PM Modi for inviting a high-level Pakistani delegation to visit the Indian Air Force Base in Pathankot, weeks after it was attacked allegedly by Islamabad-backed terrorists.
Now the question is how come a law maker can be so much ignorant of law that he is not supposed to show all the security checks of Parliament? Is he deserved to be in house at all?
How this law maker is so ignorant that PM has not invited Pak team at his personal invitation. There are set rules to do the sovereign duty. There are parliamentary committees, cabinet committees, the ministry of defence, ministry of Home Affairs and internal security, there are bilateral agreements, there is national security agency, there is National Investigating Agency and whole government machinery to propose and endorse such decisions in the national interest. Our PM does not take decision in his personal capacity but his such acts are sovereign act. Does this accused Mr. Mann so much ignorant or he is trying to fool the citizens of this country in general and Members of Parliament in particular?
Mr. Mann should understand that law has to take its own course whether you are a law maker or an ordinary citizen of this country. 
If lawlessness is created and exhibited by the law maker himself, then what can you expect from ordinary citizens. Are we not supposed to follow the law of the land? The action of Mr. Mann and his subsequent reaction, if endorsed shall lead our whole country to anarchy?      

KARUNA SHANKER OJHA

Feedback : ks_ojhaji@yahoo.com

Saturday, 23 July 2016

Credibility of a aspiring young leader

Recently on 21st July,the Vice President of Indian National Congress visited victims and their relatives in Una and Rajkot in Gujarat.He sipped a cup of tea with certain people around him and asked about the welfare of the hospitalised victims and their relatives.
So far so good,a national leader flying all the way from Delhi and meeting people who are traumatized and suffering from beating is a welcome move.
Once the leader left the site, one of the reporter of a national TV channel entered the hospital and asked two of the admitted patients if they were satisfied with the visit of the leader and if they are hopeful of what has been assured by the visiting VVIP to them? Without any pause,the persons stated that they are not giving any importance to this visit as it is made merely by keeping UP elections in view.The visiting leader has nothing to do with the welfare of the poor people like us.The leader want to mobilise votes from our community, that is this visit has been made by him.The patients further stated that they are not at all hopeful that the assurances given by the leader to them shall be translated into action.
Subsequent probe done by one of the daily newspaper reporter found that the lady with which the visiting leader shook hand met her with all the affection by putting his hand around her shoulder was neither a patient nor a relative of any of the victims of Una incident.It is suspected that this particular outspoken lady was  deliberately chosen to talk to the visiting leader. A question is also raised about the lapse in the security of the VVIP by putting this unconnected lady to meet the leader.
Yet another report says that a person was though discharged from hospital but he was again admitted to the hospital as the Vice President of INC was schedule to visit the hospital.
The entire visit and spending lacs of rupees ( a portion of expenses may be from the party fund but tax payers money has also been spent in making security and other arrangements for this visit.) appears to be made to enact this whole drama and have some photos to be circulated by media.
Question is whether all this happened with full knowledge of visiting leader and if so,is it the way to deal with common people?Is it not fooling public in general and victims in particular. Do any credibility is left with the leader?Can we rely and believe him any more?  
          

Friday, 22 July 2016

Punishment and Crimes

Today,while visiting Gujarat,the Coordinator of AAP has made two remarks one he is going to teach a lesson to BJP that it will remember for ever,second ,the accused should be punished so severely that  it should send shivering through spinal cord witnessing that punishment.

We,in India have a  judicial system and the Indian Penal Code for punishing the convicts.The investigating agency after collecting evidences file the charge sheet in the court of law and depending upon the arguments put forward by the prosecution and defence,the court applies it mind to the whole matter and awards the punishment.In this particular case also it has been announced by state govt that for rapid justice a special court will be assigned this case.
When the AAP coordinator says that severe and exemplary punishment should be awarded to the accused,does he mean that punishment as being  given by ISIS should be introduced in India keeping our IPC aside.( many shivering videos of brutal killing by using knife in Halal style or burn the person alive by putting him in a cage etc are in circulation in social media ).What he means to say? Should Constitution of India be kept aside for punishing accused in Una case?
Similarly,when this gentlemen talks about teaching a lesson,what he want to say? How he want to teach a lesson ? By taking law into his own hand and teach lesson to his opponents?From where he derived the authority to teach lesson to any body in India.Does he believes in Indian Constitution and law of the land.        
Use and Abuse

BSP Supremo has made a remark made against her as a subject of national debate including at the floor of Parliament.
Dharna,demonstration,rally,effigy burning,violence,road blocking and what not at many places in the country is being witnessed.
Right,in our country we believe that females are like Goddesses and we respect them with the core of our heart unlike western countries. One may come across scenes in rail,bus,hospitals,cinemas,parks or for that matter at any public place,where we provide them preference and comfort.
No body has right to abuse a lady that too a public figure in this manner.
But,there is a but. Our Behenji started her carrier with abusing one or the another section of the society.If one had chance to listen to her speeches two decades ago,one would be ashamed to repeat that language and adjectives used by her.
It is said that when you point out one finger towards others,four fingers are pointing towards yourself.
We can not justify the abuse hurled at her recently but can definitely say that Behanji should also introspect herself before creating such a hue and cry.        

Thursday, 21 July 2016


Pellet or Bullet

The other day,Jyotirmay Scindia and Gulam Nabi Azad both the congress leaders accused Central govt that the treatment meted out to the people in Kashmir in recent incidents was wrong.They stated that the treatment towards ordinary citizens can not be similar to the terrorists.Some other leaders such as Owaisi also levelled charge that thousands of people and innocent boys have been injured and some of them have lost their vision.
They also stated that ration and medicines are not being supplied in Kashmir and people are facing difficulty on account of continuous curfew in the area.
It is true that post Burhan Wani encounter and his burial, there has been lot of disturbances in the valley.According to one estimate around two and half lac people participated in Janaja of Wani.
Till now,no body has disputed that Wani was a hardcore terrorist involved in attacking security forces,JK police as also army.
The question has also been raised if Wani could have been arrested alive.  
The people who were pelting stones at security forces and who were trying to help and provide cover to terrorists to escape can not be treated as ordinary innocent citizens.These people could have remained in their homes when encounter was going on.Where was the need of their participating in such attack on police and army?Therefore to project this stone pelting group as innocent boys or harmless citizens is not correct.There have been many videos on you tube showing that the police or security personnel beating hit,kicked,beaten so severely that he fell down on the ground but he did not used his gun to shoot the attackers.In any ordinary circumstances,the personnel could have killed many in self defence,but it did not happen.This clearly shows that armed forces kept lot of patience while dealing with miscreants.
Pellets were preferred over bullets so that no life is lost.People accusing security forces must also suggest as to how the mob could have been handled and how the Wani could have been arrested alive.It is fact that the person on spot is the best judge to decide the step to be taken to control hostile mob.
It is easier to issue statements and speak seating in chambers then to face the mob.
Leaders accusing the authorities are very conveniently forgetting the encounters and curfew imposed in the valley when they were at the helm of affairs.Did ration and medicines were supplied through home delivery in past during curfew during previous regime.
In nutshell to accuse others is easy then acting in the larger interest of the country.
  
    

Thursday, 11 February 2016

कब लगेगी लगाम ?

कब लगेगी लगाम ?
इन झूठ आधारित ख़बरों से  हो रही आम जनता की मानसिक यातना से छुटकारा कब ?
      भारत का आम नागरिक यह अपेक्षा करता है कि उसे सत्य आधारित समाचार मिले | यह उसका हक़ भी है | कुछ समय पहले कुछ पेपर आधी अधूरी खबर छापते थे या फिर किसी खास खबर को कुछ समाचार पत्र अपनी पालिसी के तहत स्थान ही नहीं देते थे | फिर एक दौर ऐसा आया की खबर छपती तो जरूर थी पर तोड़ मरोड़ कर ,यहाँ तक की प्रेस कांफेरेंस में प्राप्त उत्तरों में से खबर बनाने के लिए कुछ समाचार पत्र अपनी कल्पना शक्ति का उपयोग करके उसका अर्थ वैसे ही निकालते थे जैसी समाचार पत्र की पालिसी कहती थी |
       हाल के कुछ दिनों में जनता के सामने  समाचार पेश करने का तरीका बदल छुका है और आजकल टी॰वी॰,इलेक्ट्रोनिक मीडिया तथा प्रिंट मीडिया में शुद्ध झूठी व किसी चर्चित व्यक्ति द्वारा स्वयं पैदा की गयी खबर का खूब प्रचार प्रसार हो जाता है और बाद में पकडे जाने पर चुपचाप गलती मान या चुप रह कर ऐसे  गलत प्रचार के दोष से खबर बनाने वाले साफ बच जाते है |         
      26/11 का हमला फिर सुर्खियों मे आ गया है, जब से हेडली के बयान अमेरिका से वाया विडियो हो रहे है तब से ही देश का सारा मीडिया उसके बयान को रिपोर्ट कर रहा है | सरकारी वकील उज्ज्वल निकम जिन्होने  26/11 के केस को कसाब की फांसी तक पहुंचाया वो अब हेडली से सच उगलवाने मे कामयाब हो रहे है | हेडली भी बिना लाग लपेट के व बिना खौफ के जवाब दे रहा है। 26/11 की पूरी साजिश का पर्दाफ़ाश कोर्ट मे केस चला तब ही हो गया था व आरोप साबित हो गए तभी तो हाइ कोर्ट,सूप्रीम कोर्ट व अंत मे राष्ट्रपति तक की गई मर्सी पिटिशन खारिज होना इस बात का पूरा प्रमाण है की साजिश पाकिस्तान मे रची गई और लश्कर ए तौबा मुखिया हाफिज़ सईद और कमांडर जाकिर रेहमान लकवी ने पाकिस्तान की गुप्तचर एजेन्सी आईएसआई के सक्रिय सहयोग से रची गई थी ।
       हेडली अमेरिका की जेल मे 35 साल की सजा भुगत रहा है और जेल से ही विडियो कोंफेरेंस के मार्फत ब्यान दे रहा है।उसने  बताया की वह कई बार पाकिस्तान से भारत आया,उनकी दो बार हमले की कोशिश असफल रही व तीसरी बार कामयाबी मिली ।उसने आतंकवादियों के चयन से उनके प्रशिक्षण तथा उन्हे हथियार मुहैया करने से रेकी करने की पूरी जानकारी देने व हमले के दौरान हंडलेर तक के खुलासे किए है |
      इस संबंध मे सहारा इंडिया,लखनऊ के अज़ीज़ बर्नी ने 26/11 के हमले पर लिखे अपने लेखों को संकलन कर 6 डिसेम्बर 2010 को एक पुस्तक प्रकाशित की थी जिसका नाम था “26/11:आरएसएस की साजिश ”।इस  पुस्तक का विमोचन कार्यक्रम बड़े पैमाने पर किया गया जिसमे विशेष रूप से कांग्रेस के महामंत्री दिग्विजय सिंह को आमंत्रित किया गया ,उनके साथ मशहूर फिल्मी हस्ती महेश भट्ट व अन्य लोग मौजूद थे |
      इस कार्यक्र्म मे दिग्विजय सिंह ने कहा की उनके पास महाराष्ट्र के एटीएस  चीफ़ हेमंत करकरे का 26/11 को हमले के दो घंटे पहले फोन आया था और करकरे ने उन्हे बताया था कि उनकी जान जोखिम में है क्योंकि मालेगांव ब्लास्ट के हिन्दू कट्टरपंथियों व आरोपियों की तरफ से उन्हे लगातार धमकियाँ मिल रही है |
    कुछ दिनों बाद उन्होने इंडियन एक्सप्रेस को दुबारा यही बात बतायी जिससे एक राष्ट्रीय चर्चा शुरू हो गई। हेमत करकरे की पत्नी ने दिग्विजयसिंह पर आरोप लगाया कि वे उनके पति की मौत को लेकर राजनीति कर रहे है | ऐसा सुनकर दिग्विजय तुरंत पलट गए और ब्यान दिया की हेमंत करकरे ने उन्हे फोन नहीं किया था बल्कि उन्होने हेमंत करकरे को फोन किया था। परंतु बीएसएनएल 12 महीने से ज्यादा पुराना डाटा नहीं रखते इसलिए उनके लिए इस कॉल का रेकॉर्ड दिखाना संभव नहीं है |
        उक्त पुस्तक में  अज़ीज़ बर्नी ने लिखा कि  हेमंत करकरे मालेगांव ब्लास्ट के बारे मे बड़े खुलासे करने वाले थे जिससे बड़े बड़े हिन्दू साधू व संतों की पोल खुल जाती, इसलिए संघ परिवार ने अमेरिका की गुप्त एजेंसी सीआईए व सऊदी अरबिया की मोस्साद  से मिलकर 26/11 की साजिश रची | पुलिस ऑफिसर करकरे एके 47 की गोली से नहीं मरे बल्कि महाराष्ट्र पुलिस मे हिंदुवादी पुलिस अफसरों के सर्विस रिवॉल्वर से मार दिये गए | इसमे कार्य में गैंगस्टर छोटा राजन का भी हाथ है |
        पुस्तक मे आगे लिखा कि आरएसएस के इन्द्रेश कुमार ने पाकिस्तान के आईएसआई से ऐसी कारवाई के लिए 3 करोड़ रुपए लिए थे ,और उसी दिन करकरे को धमकी भरा फोन आया व दूसरे दिन उन्हे मार दिया गया | बजरंग दल बम्ब बनाने की ट्रेनिंग देता है ,प्रवीण तोगड़िया के पैसों से हथियार उपलब्ध कराये जाते है |यहाँ तक कहा गया की बजरंग दल का कोड नाम है इंडियन मुजाहिदीन | कोम्युनालिस्म कोम्बाट की संपादक तीस्ता सेतलवाड ने एक रिपोर्ट मे लिखा कि सीबीआई  हिन्दू आतंकवाद को छुपा रही है और दिल्ली मे  बाटला हाउस की मुठभेड़ फर्जी थी | बर्नी ने पुस्तक मे लिखा की भारत की सेना व पुलिस की मानसिकता मुस्लिम विरोधी है | करीब 100 से ज्यादा हिंदुत्ववादी संगठन जिनका  संबंध आरएसएस से है वो हिंसा के कार्यों मे लगे हुये है | इसलिए चुनाव आयोग को बीजेपी पर प्रतिबंध लगाना चाहिए और बीजेपी को चुनाव लड़ने से रोकना चाहिए |
        इस पुस्तक के प्रकाशन को लेकर जब एक विनायक जोशी ने नवी मुंबई की एक कोर्ट मे एक केस अज़ीज़ बर्नी के खिलाफ किया तो तुरंत बर्नी ने 28 जनवरी 2011 को फ़ैक्स के माध्यम से विनायक जोशी को भेजे अपने पत्र मे माफी मांगते हुये और आगे से इस तरह से नहीं लिखने का वादा करते हुये आरएसएस से गुजारिश की कि उनके काम मे बाधा आ रही है और उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है इसलिए कोर्ट केस वापस ले लिया जाय |  बर्नी ने अपने माफीनामे में लिखा कि उनका इरादा किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं था व उनका इरादा भारत की सुरक्षा संगठनों /एजेंसीयो अथवा देशभक्त संगठनो को निशाना बनाना नहीं था आदि आदि |
संघ ने बर्नी की माफी को खारिज किया और कोर्ट केस यथावत रखा |
अब डेविड हेडली के बयान से एक बार फिर पुष्टि हो रही है कि 26/11 की साजिश पाकिस्तान में रची गयी और इससे आरएसएस का कोई लेना देना नहीं है |
         इस सारे वाकिए से लगता है कि भारत मे बोलने की आज़ादी कुछ ज्यादा ही मिली हुई है | कोई भी व्यक्ति किसी भी के खिलाफ कुछ भी आरोप लगा सकता है और पकड़े जाने पर माफी मांग कर निकल जाओ नीति के तहत बच निकलने में रहता है | भले ही राष्ट्र को हानि हो,लोगों की भावनाए भड़के और हिंसा ज़ोर पकड़े ,लिखने वाले की बला से |
       चिंता का विषय यह है  की कि क्या ऐसी हरकतों से भारत कभी उभर पायेगा ? क्या कोई अलग से कानून नहीं बनना चाहिए,जिसमे पर केवल झूठ को आधार बना कर रची गई खबर का पर्दाफाश होने पर कड़ी सजा का प्रावधान हो? आजकल झूठ आधारित खबरों की जैसे बाढ़ आ गई है और देश की जनता को गुमराह करने की पूरी कोशिश होती है । न सिर्फ टी.वी. और सोशल मीडिया बल्कि प्रिंट मीडिया भी बिना सत्यापन के कई समाचार छाप देते है और झूठा साबित होने पर एक छोटा सा संशोधन छाप कर मामले की इतिश्री कर दी जाती है। क्या यह काफि है ।या तो वर्तमान कानून ऐसी हरकतों पर लगाम लगाने को काफि नहीं है या फिर वर्तमान कानून का कोई खौफ नहीं आरएच गया है | देश की जनता सत्य आधारित समाचारों की हकदार है और गलत समाचारों से जनता को गुमराह करने वालों के लिए एक प्रभावी आचार संहिता तथा साथ ही एक नए और कड़े कानून की आवश्यकता है | पाठक व प्रबुद्ध वर्ग इस पर सामूहिक व व्यापक चर्चा कर प्रयास करे तो आम जनता को मानसिक यातना से राहत मिल सकती है |